शिक्षा के क्षेत्र में महिलाओं ने अपनी मेहनत, लगन और संघर्ष की बदौलत मुकाम हासिल किया है। शिक्षण संस्थानों में उच्चस्थ पदों पर काबिज हुईं। विपरीत माहौल, आर्थिक चुनौतियां अन्य मुश्किलों को अपनी राह की बाधा नहीं बनने दिया। इनका कहना है कि इन्होंने दृढ़ इच्छा शक्ति के बदौलत कठिन रास्तों से गुजरकर अपनी मंजिल पाई है। इन सभी ने हिंदी माध्यम से पढ़ाई की।
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प्रो. बीना शर्मा, विभागाध्यक्ष, अध्यापक शिक्षा विभाग, केंद्रीय हिंदी संस्थान
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जहां चाह है, वहीं राह है...प्रो. बीना शर्मा, विभागाध्यक्ष, अध्यापक शिक्षा विभाग, केंद्रीय हिंदी संस्थान
जब कभी भी मैं किसी समस्या से परेशान हुई तो माताजी दही-बड़े बनने की कहानी दोहरा देती, पहले थे हम मर्द, मर्द से नार कहाये, गये उदधि में कूद, वस्त्र सब अंग बहाये, गये शिला पर पीस सब तन पिसबाये...। वह कहती थीं बड़े बनने का संकल्प लिया है तो मुसीबतों से मत घबराओ, उनका सामना करो। जीवन की यही सीख नौकरी में काम आई। हिंदी माध्यम से पढ़ाई की। एक बार मेरी हैदराबाद सेंटर पर तैनाती थी। बस बीच रास्ते पहुंची तो तूफान आ गया। ऐसे ही मिजोरम स्थित सेंटर पर जा रही थी, भूस्खलन हो गया। रात को साढ़े तीन बजे रास्ते में फंस गई। यहां भी हिम्मत से काम लिया। मैं डर सकती थी, नौकरी छोड़ सकती थी। ऐसा नहीं किया।
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डॉ. शिखा श्रीधर, हिंदी विभागाध्यक्ष, श्रीमती बीडी जैन कॉलेज
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घर के काम करते हुए पूरे लगन से की पढ़ाई... डॉ. शिखा श्रीधर, हिंदी विभागाध्यक्ष, श्रीमती बीडी जैन कॉलेज
परिवार में 12 लड़कियां थीं। आर्थिक स्थिति भी ज्यादा ठीक नहीं थी। समाज की सोच से अलग परिवार ने बेटियों की पढ़ाई को तवज्जो दी। बाबा पंडित मेवा राम शर्मा प्राइमरी स्कूल में हेडमास्टर थे। वह मेरे साथ मेरी सभी बहनों को पढ़कर अपने पैरों पर खड़े होने के लिए प्रेरित करते थे। हम सभी घर का सारा काम करती थीं। दूर से पानी लाना पड़ता था। घर के कामकाज के साथ पूरे मन से पढ़ाई की। सपना था कि जिस कॉलेज की जिस कक्षा में पढ़ाई की थी, उसी में एक दिन विद्यार्थियों को पढ़ाऊं। मैंने हिंदी माध्यम से पढ़ाई की और सपना सच हुआ। मेहनत के बदौलत सपना साकार हुआ। पति का भी भरपूर सहयोग मिला। 12 में से आठ बहनें शिक्षण कार्य से जुड़ीं।
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डॉ. रेखा पतसारिया
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पति को दी किडनी दी और फिर से काम में जुट गई... डॉ. रेखा पतसारिया, प्राचार्य, आगरा कॉलेज
मुझे पढ़ाई के दौरान किसी प्रकार का संघर्ष नहीं करना पड़ा। गत दस वर्षों में शिक्षण कार्य के साथ पारिवारिक जिम्मेदारियों के निर्वहन की चुनौती सामने रही। कभी हौसला नहीं हारा। पति की बीमारी, बच्चों की पढ़ाई की वजह से संघर्षों का लंबा कालखंड रहा। पति का किडनी प्रत्यारोपण हुआ। मैंने अपनी किडनी दी। परिवार और कार्य क्षेत्र में सामंजस्य स्थापित करते हुए आज प्राचार्य के पद तक का सफर तय किया है। मैंने पूरे मनोयोग से नौकरी की। सेवा में मुझे जो भी मिलना चाहिए था, सब मिला है। योग्यता व वरिष्ठता के आधार पर यह स्थान प्राप्त हुआ है।
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डॉ. मधुरिमा शर्मा, पूर्व विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग, सेंट जोंस कॉलेज
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स्कूल से कॉलेज तक कोई दाखिला कराने साथ नहीं गया...डॉ. मधुरिमा शर्मा, पूर्व विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग, सेंट जोंस कॉलेज
मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति ज्यादा ठीक नहीं थी। सामूहिक परिवार था। पढ़ाई के संबंध में लोगों के अलग-अलग विचार थे। पढ़ाई करने में माता-पिता का भरपूर सहयोग मिला। खासतौर पर मां का। मैं रात 12 बजे तक पढ़ती थी। मां भी उतनी देर तक जगती थीं, वह भी उपन्यास आदि पढ़ती रहती थीं। इससे पढ़ाई करने में और मन लगता था। हालांकि मेरे अंदर आत्मनिर्भरता का भाव बचपन से ही था। पिता या किसी ने कभी भी स्कूल नहीं छोड़ा। यहां तक की स्कूल से लेकर कॉलेज तक मैंने खुद ही प्रवेश भी लिया, कोई साथ नहीं गया। शिक्षकों का भरपूर सहयोग मिलता था। बड़ी बहन रत्नमुनि जैन इंटर कॉलेज में प्रिंसिपल थीं। उन्होंने बहुत सहयोग दिया। इससे एकेडमिक रिकॉर्ड बहुत अच्छा बन गया।
ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई पूरी की...कुमुद ग्रोवर, प्रधानाचार्य, रामस्वरूप सिंघल गर्ल्स इंटर कॉलेज
मेरे परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। पढ़ाई के लिए माता-पिता दोनों का सहयोग भरपूर था। जबकि परिवार से ही जुड़े कुछ सदस्य लड़कियां की शिक्षा के पक्ष में नहीं थे। मेरे माता-पिता ने बेटे और बेटियों में कोई अंतर नहीं था। घर की आर्थिक दशा को देखते हुए मैंने कक्षा 10 के बाद से ही ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया। ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने लगी। पिता बल्देवराज ग्रोवर आर्मी में थे। वह अपना काम छोड़कर मुझे परीक्षा दिलाने जाते थे। साइंटिस्ट-बी का साक्षात्कार दिलाने जाते समय पिता का एक्सीडेंट हो गया। इससे साक्षात्कार नहीं हो पाया। बाद में रक्षा मंत्रालय में जेआरएफ से नौकरी की शुरुआत हुई। बाद में जवाहर नवोदय विद्यालय में टीजीटी, फिर उप प्रधानाचार्य बनी। वर्ष 2010 में आयोग से रामस्वरूप सिंघल विद्यालय की प्रधानाचार्य बनी।