बदलते परिवेश में पालन-पोषण और खानपान के तौर-तरीके बदले हैं। जिंदगी तेज रफ्तार हुई है। मिनटों में तैयार होने के कारण मैगी सबकी पसंदीदा है। कॉलेज के दिनों से लेकर शादी के बाद भी मैगी के प्रति दीवानगी बनी हुई है। तेज भूख लगी हो और कॉलेज की मेस बंद हो या फिर मां घर पर न हों, ऐसे में बनने में आसान मैगी ने कैसे सहारा बनी, वो भुलाए नहीं भूलता। शनिवार को संजय प्लेस के होटल पीएल पैलेस में मैगी से जुड़े ऐसे ही खास पल साझा किए गए।
अमर उजाला और मैगी की ओर से ‘कल के लिए रेडी’ प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कृत करने के लिए यह समारोह आयोजित किया गया था। इसमें मैगी के साथ अपने पसंदीदा मैगी मोमेंट्स साझा करने वाली शहर की प्रतिभागियों में से विजेता कहानियां चुनी गईं। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि गोरमे क्लब की अध्यक्ष रेणुका डंग ने अभिभावकों को महत्वपूर्ण टिप्स भी दिए। बताया कि वे टीनएजर्स को कैसे सशक्त बनाएं और उन्हें कल के लिए कैसे तैयार करें।
‘कल के लिए रेडी’ अभियान के बारे में नेस्ले इंडिया के निदेशक (फूड्स एंड कन्फेक्शनरीज) निखिल चांद ने कहा कि हम उन तमाम उपभोक्ताओं से प्रतिक्रिया पाकर खुश हैं, जिन्होंने कल के लिए रेडी प्रतियोगिया के माध्यम से अपने पसंदीदा मैगी मोमेंट्स को शेयर किया। कुछ कहानियां दिल को छू गईं। मैगी ब्रांड में उपभोक्ताओं के विश्वास के लिए उन्होंने आभार जताया।
ये रहीं खास कहानियां
कार्यक्रम में बोलतीं रेनूका डंग
- फोटो : अमर उजाला
प्रथम पुरस्कार विजेता चारु शर्मा ने लिखा कि बात स्कूल के दिनों की है। मम्मी सिंगल मदर हैं। जॉब पर चली जाती थीं। एक दिन स्कूल से घर पहुंची तो पाया कि गैस खत्म थी। मम्मी ने 50 रुपये के साथ एक नोट लिखा था कि प्लीज आज बाजार से कुछ खरीद लेना। इसके बाद आइडिया आया कि क्यों न मैगी बनाकर खाई जाए। मैंने आयरन (प्रेस) को गरम करके उसकी मदद से मैगी बना डाली। मैगी हमेशा की तरह लजीज ही लगी।
दूसरे स्थान पर रहीं सरल डावर ने पापा के हाथ की मैगी का जिक्र किया। एक रात जब मम्मी की तबीयत खराब थी तो एक बजे मेरी बेटी को भूख लगी। और जो पापा कभी अपने हाथ से पानी नहीं लेते थे उन्होंने अपनी बेटी के लिए पहली बार मैगी बनाई और दोनों ने मिलकर टेस्टी यम्मी मैगी खाई।
तीसरे स्थान पर रहीं डॉ. ज्योति अग्रवाल ने हॉस्टल के दिनों का जिक्र किया। एक दिन हास्टल में साथ पढ़ने वाली बहन से झगड़ा हो गया। एक सप्ताह तक बातचीत तक न हुई। एक रविवार बहन ने रात एक बजे मैगी बनाई और हम दोनों ने मिलकर खाया। इसके बाद दोनों की बातचीत बिना किसी गिले शिकवे के शुरू हो गईं। बताया, क्लीनिक से लौटने पर अब भी मैगी खाती हूं।
कार्यक्रम में मौजूद महिलाएं
- फोटो : अमर उजाला
सांत्वना पुरस्कार पाने वाली संगीता अग्रवाल ने बताया कि एक बार उनका भाई से जोर का झगड़ा हुआ। भाई और मेरे बीच बातचीत बंद हो गई। अब मेरे मन मेरे भाई के साथ खेलने को तरसने लगा। बहुत सोचा भाई को कैसे मनाया जाए। कुछ नहीं आ रहा था। तभी आइडिया आया और मैंने अपने भाई की फेवरेट मैगी बनाई। इसे खाते ही भाई का गुस्सा काफूर हो गया।
सांत्वना पुरस्कार जीती शिखा मेहरोत्रा ने बताया कि एक बार हम बद्रीनाथ की यात्रा पर गए थे। रास्ते में एक जगह बादल फट गया और यात्रा वहीं रोक दी गई। पानी, खाने की परेशानी हो गई। लेकिन यात्रा पर जाते वक्त बेटी अक्षरा की सलाह पर मैगी के आठ दस पैकेट ले गई थी। यही उन मुश्किल दिनों में काम आई। थैंक्स मैगी।
सांत्वना पुरस्कार जीतने वाली रितिका ने बताया कि 14 साल की थी। तब एक दिन मां पापा का जोर का झगड़ा हुआ। दोनों के बीच बात बंद हो गई। आखिर पापा ने मुझसे कहा कि मां को कैसे मनाया जाए। तब मेरे आइडिया पर पापा ने मैगी बनाकर खिलाई और मम्मी के गुस्से को खत्म कर दिया।