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75वां महोत्सव विश्वास का: हर खबर पर सबसे पहले पैनी नजर, परंपरा बन गई सत्यता और सटीकता

Mon, 18 Apr 2022 04:36 PM IST
धीरेन्द्र सिंह अमर उजाला ब्यूरो, आगरा

सार

आजादी के बाद देश के विभाजन से उपजे हालात की बात हो या कश्मीर पर हमला और उसका विभाजन, देश में किसी भी बड़ी घटना या उथलपुथल की हर खबर सबसे पहले पाठकों तक पहुंचाई गई। सत्यता और सटीकता की खासियत परंपरा बन गई है।
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अमर उजाला की खबरें - फोटो : अमर उजाला
साल के सफर के दौरान अमर उजाला की हर खबर पर सबसे पहले पैनी नजर रही। आजादी के बाद देश के विभाजन से उपजे हालात की बात हो या कश्मीर पर हमला और उसका विभाजन, देश में किसी भी बड़ी घटना या उथलपुथल की हर खबर सबसे पहले पाठकों तक पहुंचाई गई। सत्यता और सटीकता की खासियत परंपरा बन गई है। 1948 के बाद से आज तक यह पैनी नजर संचार साधनों के विकल्प मिलने से और तीखी व तीव्र हो गई है।  पद्मश्री डॉ. डीके हाजरा बोले, अमर उजाला से उनका 70 साल पहले नाता जुड़ा। अमर उजाला जिम्मेदार समाचार पत्र है और उसकी पत्रकारिता गंभीर है। सामाजिक सरोकार, जन समस्याओं को प्रमुखता से उठाने के साथ निष्पक्षता उसकी पहचान है। समय बदला, लेकिन इन 70 साल में मैंने अखबार के पैमाने बदलते नहीं देखे। स्वामीबाग निवासी 79 साल के पद्मश्री डॉ. हाजरा बोले कि मैं चिकित्सकीय क्षेत्र से जुड़ा हूं तो बीमारियों के प्रति ज्यादा सजग हूं। 
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अमर उजाला स्थापना दिवस - फोटो : स्पीड कलर लैब/ कलाकुंज
पद्मश्री डॉ. डीके हाजरा ने कहा कि मैंने अमर उजाला को अस्पतालों में सुधार और बिगड़ी जीवनशैली से होने वाली हृदय रोग, मोटापा, उच्च रक्तचाप, पक्षाघात, मधुमेह जैसी बीमारियों के प्रति खबरों के जरिये जागरूक करते देखा है, यह बेहद सराहनीय है। ये बीमारियां स्वस्थ भारत के लिए चुनौती साबित होंगी। कोरोना महामारी में अमर उजाला की पत्रकारिता और निखरी। कोरोना वायरस के प्रति जागरूक करने, टीकाकरण करवाने के लिए जो मुहिम चलाई, उसका लोगों पर असर भी पड़ा। मैं आशा करता हूं, अखबार ने जो 74 साल में पत्रकारिता में गौरवशाली मुकाम पाया है, वह एक दशक तक और बढ़े। 
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अमर उजाला 75वां स्थापना दिवस - फोटो : अमर उजाला

'अमर उजाला से मेरा पीढ़ियों का रिश्ता'

स्वतंत्रता सेनानी  रानी सरोज गौरिहार ने कहा कि इस अखबार से मेरा पीढ़ियों का रिश्ता है। मैं 93 साल की हूं। मुझे याद है हम जब लखनऊ में रहते थे तब आगरा से वहां अखबार पहुंचता था। मेरे पिता पं. जगन प्रसाद रावत तब सरकार में मंत्री थे। उनके डोरीलाल जी से गहरे संबंध थे। जब भी आगरा आते डोरीलाल जी से मिलकर जाते। ये 1950 51 की बात होगी। 1974 तक मेरे पिता मंत्री रहे। वह आगरा के खेरागढ़ क्षेत्र से विधायक चुने जाते थे। मेरे दामाद जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, अमर उजाला दिल्ली में प्रबंधक थे। मेरे पिता जी का 1990 में जब निधन हुआ तो उनके जीवन पर एक विशेष लेख अमर उजाला में प्रकाशित हुआ था। 

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स्वतंत्रता सेनानी रानी सरोज गौरिहार - फोटो : अमर उजाला
उन्होंने कहा कि अखबार की बात करूं तो आगरा में जनसरोकार व समाज की उन्नति में बहुत बड़ा योगदान है। अमर उजाला जैसा कोई दूसरा अखबार नहीं। पिता जी इस अखबार की खबरें लिखने की शैली से बहुत प्रभावित थे। डोरीलाल जी और पिता जी की बहुत से यादें हैं। मुझे उम्र की वजह से ठीक से याद नहीं आ रहीं। ये अखबार अपने 75वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। मुझे ये सुनकर बहुत खुशी होती है। मैं इस अखबार की एक जमाने से सुधी पाठक हूं। आगरा में जनसरोकार व समाज की उन्नति में अमर उजाला का बहुत बड़ा योगदान है। इस जैसा कोई दूसरा अखबार नहीं। पिता जी भी इस अखबार की खबरें लिखने की शैली से बहुत प्रभावित थे। 75वें वर्ष में प्रवेश पर बहुत बहुत बधाई।
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एसएन मेडिकल कॉलेज आगरा - फोटो : अमर उजाला

अमर उजाला की खबरें सत्यता के नजदीक

एसएन मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. प्रशांत गुप्ता बोले कि हमारा परिवार लोहामंडी पुनियापाड़ा में रहता था। पिताजी ओमप्रकाश गुप्ता सरकारी नौकरी में थे और अमर उजाला परिवार से पारिवारिक रिश्ते थे। अखबार शुरू हुआ तभी से पिताजी मंगवाते थे। मैंने जब अखबार के बारे में जाना तो वह अमर उजाला ही था। शहर की खबरें प्रमुखता से मिलती हैं। रोजाना अमर उजाला पढ़ना प्राथमिकता में रहता है। इसकी खबरें चटपटी या फिर सनसनी नहीं बल्कि खबर की तरह ही लिखी जाती हैं। इसकी खबरें सत्यता के नजदीक रहती हैं। 
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अमर उजाला आगरा का कार्यालय - फोटो : अमर उजाला

किसी दल के दबाव में नहीं आता ये अखबार

आईएमए अध्यक्ष डॉ. ओपी यादव का कहना है कि मैं करहल से 1980 में सीपीएमटी की तैयारी के लिए आगरा में कोचिंग करने आया। तभी से मैं अमर उजाला का पाठक हूं। मैंने देखा देश प्रदेश में विभिन्न दलों की सरकारें रहीं, लेकिन अमर उजाला किसी के दबाव में नहीं आया और बेबाकी से निष्पक्ष पत्रकारिता  की। शहर की बुनियादी समस्या, पानी, सड़क, गंदगी और अस्पतालों में अव्यवस्थाओं को प्रमुखता से प्रकाशित करता है, अमर उजाला आगरा की 
आवाज बना हुआ है। 
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डॉ. पार्थ सारथी शर्मा - फोटो : अमर उजाला

विज्ञापन पढ़कर मिल गई थी मुझे नौकरी

गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्डधारी डॉ. पार्थसारथी शर्मा बताते हैं कि मेरे पिताजी 1984 में शाहगंज में बस गए। तब से ही अखबार आता है। 1993 में मैंने ग्वालियर में होम्योपैथी की पढ़ाई पूरी कर ली थी। एक दिन पिताजी का फोन आया और बोले अमर उजाला में होम्योपैथी चिकित्सक की जरूरत का विज्ञापन आया है। अगले दिन मैं आया और स्मृति भवन में साक्षात्कार हुआ और 23 डॉक्टरों में से मेरा चयन हुआ। यही स्मृति भवन मेरी असली कर्मभूमि बन गई। तब से अमर उजाला का लती पाठक हूं। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्डधारी डॉ. पार्थसारथी शर्मा बताते हैं कि मेरे पिताजी 1984 में शाहगंज में बस गए। तब से ही अखबार आता है। 1993 में मैंने ग्वालियर में होम्योपैथी की पढ़ाई पूरी कर ली थी। एक दिन पिताजी का फोन आया और बोले अमर उजाला में होम्योपैथी चिकित्सक की जरूरत का विज्ञापन आया है। अगले दिन मैं आया और स्मृति भवन में साक्षात्कार हुआ और 23 डॉक्टरों में से मेरा चयन हुआ। यही स्मृति भवन मेरी असली कर्मभूमि बन गई। तब से अमर उजाला का लती पाठक हूं। 
 

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अमर उजाला पढ़ते अटल बिहारी वाजपेयी और मोरारजी देसाई - फोटो : अमर उजाला

खबरों के साथ ही जन सरोकार की जिम्मेदारी

भारत विकास परिषद के प्रांत अध्यक्ष प्रमोद सिंघल ने बताया कि अखबार खबर ही नहीं सामाजिक सरोकार की भी जिम्मेदारी उठा रहा है। रक्तदान की मुहिम छेड़कर समाज को इसके प्रति जागरूक किया। इसका असर भी हुआ और कई संगठन इससे प्रेरित हुए। मां तुझे प्रणाम कार्यक्रम के जरिये नई पीढ़ी को राष्ट्रगान का महत्व समझाया। खबरें तो पूरी तरह से सटीक निष्पक्ष है हीं। कोरोना काल के दौरान स्वास्थ्य समस्याओं पर अमर उजाला की खबरों ने आम लोगों को जागरूक किया। लोगों को कोई समस्या होती तो पहले अमर उजाला में फोन करते हैं।

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अमर उजाला पढ़ते डॉ. आरएस पारीक और उनके परिवार के सदस्य - फोटो : अमर उजाला

सत्य को लिखने से कभी भी नहीं चूकता

भारत विकास परिषद के प्रांत अध्यक्ष प्रमोद सिंघल ने बताया कि अखबार खबर ही नहीं सामाजिक सरोकार की भी जिम्मेदारी उठा रहा है। रक्तदान की मुहिम छेड़कर समाज को इसके प्रति जागरूक किया। इसका असर भी हुआ और कई संगठन इससे प्रेरित हुए। मां तुझे प्रणाम कार्यक्रम के जरिये नई पीढ़ी को राष्ट्रगान का महत्व समझाया। खबरें तो पूरी तरह से सटीक निष्पक्ष है हीं। कोरोना काल के दौरान स्वास्थ्य समस्याओं पर अमर उजाला की खबरों ने आम लोगों को जागरूक किया। लोगों को कोई समस्या होती तो पहले अमर उजाला में फोन करते हैं।
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अमर उजाला का 75वां स्थापना दिवस - फोटो : अमर उजाला

सत्य को लिखने से कभी भी नहीं चूकता

व्यापारी मुकेश जौहरी का कहना है कि अमर उजाला शुरू हुआ था, उसी साल से हमारे दादा लक्ष्मण दास जौहरी मंगवाते थे। इसके बाद मेरे पिताजी हरेशचंद्र अग्रवाल, मैं और मेरा बेटा रितिक जौहरी तक अमर उजाला के ही आदी हैं। अखबार जन समस्याएं, व्यापारियों की समस्याएं प्रमुखता से उठाता है। प्रशासन और जन प्रतिनिधियों को भी उनकी जिम्मेदारी का एहसास करता है। हमारा अमर उजाला घटना की तह तक जाता है और सत्य लिखने से कभी भी नहीं चूकता। परिवार की चौथी पीढ़ी भी अमर उजाला ही पढ़ रही है। 


आगरा की आवाज बना अमर उजाला

उत्तर प्रदेश होम्योपैथिक कांग्रेस के अध्यक्ष डॉ. कैलाश चंद सारस्वत ने कहा कि अमर उजाला की पत्रकारिता निष्पष और सटीक है। जन समस्याओं और शहर के विकास के लिए खबरों के जरिये शासन प्रशासन को झकझोरता है। इसी के कारण अमर उजाला आगरा के लोगों की आवाज बन गया है। मैं 40 साल से अधिक समय से अमर उजाला का आदी हूं। अमर उजाला पढ़ने के बाद ही दिन की शुरुआत होती है। इसकी खबरें भरोसेमंद हैं, इसी कारण प्रशासन भी इनकी खबरों को गंभीरता से लेकर उनके समाधान कराता है।
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