श्री पारस अस्पताल के पीड़ितों ने डीवीआर से छेड़छाड़ के आरोप लगाते हुए जांच में देरी पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि जांच के पहले दिन ही डीवीआर क्यों जब्त नहीं किया गया ? आईएमए की जांच में मरीजों के परिजनों का कहना है कि 26 अप्रैल को सुबह सीसीटीवी कैमरे बंद कर दिए गए थे। डीवीआर को जांच के लिए लखनऊ लैब भेजा गया है।
आगरा के श्री पारस अस्पताल का वीडियो वायरल होने के बाद सबसे पहले डीएम-एसएसपी व स्वास्थ्य अधिकारी जांच के लिए पहुंचे थे। प्रशासन ने मरीजों का रिकॉर्ड जब्त किया। परंतु सीसीटीवी कैमरों का डीवीआर जब्त नहीं किया। पुलिस को डीवीआर करीब एक महीने बाद मिली। जिसकी फोरेंसिक जांच हो रही है। इधर, पीड़ितों ने डीवीआर से छेड़छाड़ के आरोप लगाते हुए जांच में देरी पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
26 अप्रैल का वीडियो सात जून को वायरल हुआ। आठ जून को सुबह पुलिस, प्रशासन व स्वास्थ्य विभाग टीम श्री पारस अस्पताल में जांच के लिए पहुंची। करीब तीन घंटे तक अधिकारियों ने अस्पताल का रिकॉर्ड जांचा। कई महत्वपूर्ण दस्तावेज जब्त किए। जिनके आधार पर डेथ ऑडिट की गई। सवाल खड़े हो गए हैं कि जब पुलिस व प्रशासन ने मरीजों का रिकॉर्ड जब्त किया था तो डीवीआर क्यों नहीं लिया गया। डीवीआर में मॉकड्रिल के साक्ष्य हो सकते हैं। क्या पुलिस को साक्ष्य मिटाने के बाद डीवीआर की हार्डडिस्क दी गई। ऐसे कई सवालों से जांच के तरीके पर ही प्रश्न चिह्न लग गया है।