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जीवन में सफलता के लिए संत कबीर ने बताएं हैं पांच बड़े सूत्र

Mon, 27 May 2019 03:52 PM IST
कशिश मिश्रा धर्म डेस्क, अमर उजाला
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कबीर के अमृत वाणी - फोटो : अमर उजाला
कबीर की वाणी
जीवन की आपाधापी में हर इंसान अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हाथ—पांव मार रहा होता है, लेकिन किसी भी क्षेत्र में सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ना इतना आसान भी नहीं होता है। अक्सर आपकी साधना के मार्ग या फिर कहें लक्ष्य की राह में तमाम मुश्किलें आती हैं। एक आम आदमी को समाज में आज जो भी समस्याएं या मुश्किलें दिखाई दे रही हैं, उनके बारे में ने बहुत पहले ही विस्तार से चर्चा कर दी थी। साथ ही उसके व्यवहारिक समाधान भी बताए थे। संत कबीर की दिव्य वाणी का प्रकाश आज भी हमें समस्याओं के अंधेरे से निकाल कर समाधान के प्रकाश में ले जाती है। आइए जिंदगी का फलसफा सिखाने वाली ऐसी ही कबीर की दिव्य वाणी का सार जानते हैं। 

संत कबीर द्वारा बताए गए सफलता के सूत्र को जानने के लिए आगे की स्लाइड क्लिक करें 
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कबीर के अमृत वाणी
1.
गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पांय
बलिहारी गुरु आपनो, गोविंद दियो बताय।


अर्थ: 
संत कबीरदास जी कहते हैं कि गुरु और गोविंद जब एक साथ खड़े हों तो उन दोनों में से आपको सबसे पहले किसे प्रणाम करना चाहिए। कबीरदास जी के अनुसार सबसे पहले हमें अपने गुरु को प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उन्होंने ही गोविंद के पास जानें का मार्ग बताया है। 
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कबीर के अमृत वाणी
2.
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
संत कबीर कहते हैं कि बड़ी—बड़ी पोथी पढ़ने का कोई लाभ नहीं है, जब तक कि आपमें विनम्रता नहीं आती है और आप लोगों से प्रेम से बात नहीं करते हैं। कबीर कहते हैं जिसे प्रेम के ढाई अक्षर का ज्ञान प्राप्त हो गया वहीं इस संसार का असली विद्वान है। 

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कबीर के अमृत वाणी
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माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर,
कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।


कर्मकांड के बारे में कबीरदास जी का कहना है कि लंबे समय तक हाथ में मोती का माला फेरने से कुछ लाभ नहीं होने वाला है। इससे आपके मन के भाव शांत नहीं होंगे। चित्त को शांत रखने और मन को काबू रखने पर ही मन की शीतलता प्राप्त होगी। कबीर दास जी लोगों को अपने मन को मोती के माला के समान सुंदर बनाने की बात करते हैं। 
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कबीर के अमृत वाणी
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जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान,
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
कबीरदास जी हमेशा जात—पात का विरोध किया। उनका कहना था कि आप किसी से ज्ञान प्राप्त कर रहे हों तो उसकी जाति के बारे में ध्यान न दें, क्योंकि उसका कोई महत्व नहीं होता है। बिल्कुल वैसे ही, जैसे तलवार का महत्व उसे ढकने वाले म्यान से ज्यादा होता है। 
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कबीर के अमृत वाणी - फोटो : social media
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जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय
यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय
कबीर मन की पवित्रता पर ज्यादा जोर देते हैं। वह कहते हैं कि यदि आपका मन साफ और शीतल है तो इस संसार में कोई भी मनुष्य आपका दुश्मन नहीं हो सकता है, लेकिन अगर आप अपने अहंकार को नहीं छोड़ेंगे, तो आपके बहुत से लोग दुश्मन बन जाएंगे। ऐसे में यदि आप समाज में खुश रहना चाहते हैं, तो किसी को भी अपना दुश्मन न बनाएं। सभी से प्रेमपूर्वक व्यवहार कीजिए। सभी आपके दोस्त बनकर रहेंगे।
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