आचार्य चाणक्य
- फोटो : Social media
तृप्त व्यक्ति के लिए अन्न
किसी भी व्यक्ति की भूख शांत करने और जीवन जीने के लिए अन्न बहुत आवश्यक होता है, लेकिन नीति शास्त्र में एक ऐसी परिस्थिति भी बताई गई है जब अन्न का कोई मतलब नहीं रह जाता है। आचार्य चाणक्य कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति तृप्त हो यानी जब किसी व्यक्ति का पेट भरा हुआ हो तो उसके लिए अन्न व्यर्थ होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि अन्न सदैव उस व्यक्ति को देना चाहिए जिसे वास्तव में उसकी आवश्यकता हो अन्यथा वह अन्न व्यर्थ है।