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चाणक्य नीति: इन परिस्थितियों में अन्न, वर्षा का जल और दीपक का प्रकाश भी हो जाता है व्यर्थ

Fri, 04 Jun 2021 10:05 AM IST
Shashi Shashi धर्म डेस्क, अमर उजाला
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आचार्य चाणक्य - फोटो : Social media
आचार्य चाणक्य चंद्रगुप्त के महामंत्री थे। इन्होंने ही अपनी बुद्धि और नीतियों को बल पर नंदवंश का नाश करके चंद्रगुप्त को एक साधारण बालक से मौर्य साम्राज्य का शासक बनाया। ये चंद्रगुप्त के महामंत्री होते हुए भी राजसी ठाट-बाट से दूर एक कुटिया में साधारण जीवन व्यतीत करते थे। इनको कौटिल्य और विष्णु गुप्त भी कहा जाता था। चाणक्य नाम इनको अपने गुरु चणक से प्राप्त हुआ था। आज के समय में भी यदि श्रेष्ठ विद्वानों की बात की जाए तो चाणक्य का नाम अवश्य लिया जाता है। ये एक कुशल कूटनीतिज्ञ, राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री और महाविद्वानी थे। इनका संबंध विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालय तक्षशिला से था। इन्होंने तक्षशिला से शिक्षा प्राप्त की और वहीं पर आचार्य के पद पर रहते हुए विद्यार्थियों को शिक्षा भी प्रदान की। इस तरह से ये एक श्रेष्ठ विद्वान होने के साथ एक योग्य शिक्षक भी थे। इन्हें कई विषयों की गहरी समझ थी। इनके द्वारा द्वारा कई महत्वपूर्ण शास्त्र लिखे गए। जिनमें से नीतिशास्त्र की बातें आज के समय में भी लोगों को जीवन की सही राह दिखाती हैं। हालांकि आज के समय में कुछ लोगों को चाणक्य की नीतियां कटु लगती हैं परंतु ये मनुष्य को जीवन की सत्यता से अवगत कराती हैं। नीतिशास्त्र में कुछ ऐसी परिस्थितियों के बारे में बताया गया है जब वर्षा का जल, अन्न और दीपक की रोशनी भी व्यर्थ होती है। जानते हैं कि कौन सी हैं वे परिस्थितियां।
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आचार्य चाणक्य - फोटो : Social media
समुद्र में होने वाली वर्षा 
वर्षा का पानी बहुत अनमोल होता है यह किसानों के खेतों की सिचांई करता है। नदियों में जाकर पशु-पक्षियों और मनुष्य की प्यास बुझाता है लेकिन आचार्य चाणक्य कहते हैं कि समुद्र में वर्षा का जल व्यर्थ है क्योंकि वह उसी में मिलकर खारा हो जाता है और ऐसे जल का कोई मतलब नहीं रह जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी भी चीज का मूल्य उसकी परिस्थिति पर निर्भर करता है।
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आचार्य चाणक्य - फोटो : Social media
दिन के समय जलने वाला दीपक
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि दिन के समय जलने वाले दीपक की रोशनी व्यर्थ है क्योंकि प्रकाश की आवश्यकता अंधेरे में होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति को सही समय पर सही वस्तु की आवश्यकता होती है यदि वह गलत समय पर प्राप्त हो तो उसका कोई अर्थ नहीं रह जाता है जिस प्रकार दिन के समय जलने वाले दीपक का कोई अर्थ नहीं होता है।
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आचार्य चाणक्य - फोटो : Social media
तृप्त व्यक्ति के लिए अन्न
किसी भी व्यक्ति की भूख शांत करने और जीवन जीने के लिए अन्न बहुत आवश्यक होता है, लेकिन नीति शास्त्र में एक ऐसी परिस्थिति भी बताई गई है जब अन्न का कोई मतलब नहीं रह जाता है। आचार्य चाणक्य कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति तृप्त हो यानी जब किसी व्यक्ति का पेट भरा हुआ हो तो उसके लिए अन्न व्यर्थ होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि अन्न सदैव उस व्यक्ति को देना चाहिए जिसे वास्तव में उसकी आवश्यकता हो अन्यथा वह अन्न व्यर्थ है।
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