आचार्य चाणक्य
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पुस्तकेषु च या विद्या परहस्तेषु च यद्धनम्
उत्पन्नेषु च कार्येषु न सा विद्या न तद्धनम्
आचार्य चाणक्य इस श्लोक के माध्यम से कहते हैं कि जो विद्या पुस्तक में रहती है वह व्यक्ति के किसी काम की नहीं रहती है। यहां पर कहने का तात्पर्य यह है कि जो ज्ञान केवल किताबों तक सीमित रहता है और व्यक्ति वक्त आने पर उसका प्रयोग नहीं कर पाता है ऐसे ज्ञान का कोई औचित्य नहीं होता है। यहां पर कहा गया है कि व्यक्ति को किताबी ज्ञान के साथ व्यवहारिक ज्ञान की भी समझ होना अति आवश्यक होता है। जो लोग केवल किताबों को रटते हैं और व्यवहारिकता की समझ नहीं होती है, वह ज्ञान किसी काम का नहीं होता है। इसी तरह आचार्य चाणक्य यह भी कहते हैं कि व्यक्ति को गुरु से ज्ञान लेते समय अपनी जिज्ञासा को पूरी तरह से शांत करना चाहिए। आधे-अधूरे ज्ञान का कोई फायदा नहीं रहता है। जब मनुष्य को उस ज्ञान का प्रयोग करने की बारी आती हैं तो पूरी तरह से ज्ञान न होने के कारण वह पीछे रह जाता है।