धर्म की रक्षा के लिए कौरवों और पाण्डवों के बीच भयंकर युद्ध हुआ था जिसे हम महाभारत के युद्ध के नाम से जानते हैं। इस युद्ध में सारथी के रूप में कृष्ण ने पांडवों का साथ दिया था। महाभारत में कई ऐसे नाजुक मौके आए जहां पर भगवान कृष्ण ने अर्जुन के प्राणों की रक्षा की थी। उन्हीं में से एक प्रसंग यह भी है।
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महाभारत के युद्ध में जयद्रथ नाम का एक योद्धा था जो कौरवों की तरफ से युद्ध कर रहा था। युद्ध के दौरान जब एक दिन अर्जुन लड़ते-लड़ते युद्धक्षेत्र से काफी दूर तक निकल गये थे। तब इसका फायदा उठाते हुए जयद्रथ सहित कौरवों ने अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु को चक्रव्यूह में फंसा कर वध कर दिया था।
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अभिमन्यु की मृत्यु का समाचार जब अर्जुन को मिला तो वह बेहद क्रोधित हो उठे। अर्जुन युद्ध के मैदान के बीचोबीच पहुंचे और सबके सामने जयद्रथ को चुनौती दी।
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तब अर्जुन ने प्रतिज्ञा लेते हुए कहा कि कल मैं जयद्रथ का वध करके अपने पुत्र की मौत का बदला लूंगा। यदि मैं सूर्यास्त से पहले वध न कर सका तो मै अपने प्राण त्याग दूंगा।
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लेकिन जयद्रध को मारना इतना आसान नहीं था, दरअसल जयद्रध को उसके पिता के द्वारा वरदान मिला था। वरदान के अनुसार जो भी जयद्रथ को मारेगा और उसका सिर जमीन पर गिराएगा, उसके सिर के हजारों टुकड़े हो जाएंगे। यही एक कारण है कि कुरुक्षेत्र युद्ध मे जयद्रथ को मारना बेहद मुश्किल हो गया था।
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युद्ध के अगले दिन अर्जुन जयद्रथ को तलाश करने लगे, लेकिन वह नहीं मिला। क्योंकि कौरवों ने जयद्रथ को छिपा रखा था। इसके साथ समय निकलता जा रहा था और अर्जुन निराश होने लगे।
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तब जयद्रथ को बाहर निकालने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र का सहारा लिया। उन्होनें सुदर्शन चक्र की मदद से सूर्य को थोड़ी देर के लिए छिपा लिया और शाम हो गई।
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शाम होते ही जयद्रथ अपनी सेना के कवच से बाहर आ गया तब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आदेश देते हुए कहा कि तुम्हारा शत्रु अब तुम्हारे सामने है और उसको मिले वरदान के बारें में बताया।
तब अर्जुन का तीर जयद्रथ का सिर काटते हुए हवा में उड़ाकर ले गया और सीधा जयद्रथ के पिता की गोद में जा गिरा। तप में लीन जयद्रथ के पिता अचानक उठ खड़े हुए जिसके कारण उनकी गोद से जयद्रथ का मस्तक धरती पर गिर गया। इस तरह से भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन का जान बचाई।