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Mahashivratri 2021: जानिए क्यों भगवान शिव धारण करते हैं सिर पर मां गंगा से लेकर पैरों में कड़ा तक...

Mon, 01 Mar 2021 07:03 AM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन, वास्तुविद
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MAHASHIVRATRI
भगवान शिव ऐसे देव हैं जिनकी पूजा-आराधना से सभी प्रकार के कष्टों का शमन होता है। महादेव थोड़ी सी श्रद्धा भक्ति के साथ की गई पूजा से तुरंत प्रसन्न हो जाते है एवं पूजा-आराधना से भक्तों की मनोकामनाएं शीघ्र पूरी होती हैं। भगवान शिव का श्रृंगार अन्य देवताओं की तुलना में सबसे निराला है, जो अपनी अलग-अलग प्रकृति को दर्शाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार शिवजी के हर आभूषण का विशेष प्रभाव तथा महत्व बताया गया है। आइए जानते है क्या महत्व है शिव के श्रृंगार का...
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mahashivratri - फोटो : social media
सिर पर धारण करते हैं गंगा-
गंगाजी को भोलेनाथ का प्रथम और मुख्य शृंगार माना गया है। शिवजी के गांगेय, गंगेश्वर, गंगाधिपति, गंगेश्वरनाथ आदि नाम पुनीत गंगा को धारण करने के कारण ही हैं। पृथ्वी की विकास यात्रा के लिए जब गंगा जी को स्वर्ग से धरती पर लाया गया, तो पृथ्वी की क्षमता गंगा के आवेग को सहने में असमर्थ थी। ऐसे में सदाशिव ने अपनी जटाओं में गंगा को स्थान देकर यह सन्देश दिया कि आवेग की अवस्था को दृढ़ संकल्प के माध्यम से संतुलित किया जा सकता है।
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Mahashivratri 2021 - फोटो : अमर उजाला
शीश पर है चन्द्रमा का मुकुट
चन्द्रमा को शिवजी का मुकुट कहा गया है। शास्त्रों के अनुसार शिवजी के त्रिनेत्रों में एक सूर्य, एक अग्नि और एक चंद्र तत्व से निर्मित है। चंद्र आभा, प्रज्जवल, धवल स्थितियों को प्रकाशित करता है, जो मन के शुभ विचारों के माध्यम से उत्पन्न होते हैं। ऐसी अवस्था में प्राणी को अपने यथा योग्य श्रेष्ठ विचारों को पल्ल्वित करते हुए सृष्टि के कल्याण की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। चंद्रमा का एक नाम 'सोम' है, जो शांति का प्रतीक है। इसी हेतु सोमवार शिवपूजन, दर्शन और उपासना का दिन माना गया है।

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Mahashivratri 2021 - फोटो : अमर उजाला
तीन गुणों का प्रतीक त्रिशूल-
शिवजी के श्रृंगार में त्रिशूल का विशिष्ट स्थान है। त्रिशूल के तीन शूल क्रमशः सत, रज और तम गुण से प्रभावित भूत, भविष्य और वर्तमान का द्योतक हैं। त्रिशूल के माध्यम से युग-युगांतर में सृष्टि के विरुद्ध सोचने वाले राक्षसों का संहार किया है।
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महाशिवरात्रि
भस्म करते हैं धारण-
शिव अपने शरीर पर भस्म धारण करते हैं,। भस्म से नश्वरता का स्मरण होता है। प्रलयकाल में समस्त जगत का विनाश हो जाता है, केवल भस्म (राख) शेष रहती है। यही दशा शरीर की भी होती है। वेद में रुद्र को अग्नि का प्रतीक माना गया है। अग्नि का कार्य भस्म करना है अत: भस्म को शिव का श्रृंगार माना गया है।
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महाशिवरात्रि
नागदेवता रहते हैं गले में 
शिवशंकर के गले के हार 'सर्प' को प्रभु का अतिप्रिय माना गया है। जब अमृत मंथन हुआ था,तब अमृत कलश के पूर्व गरल(विष)को उन्होंने कंठ में रखा था। जो भी विकार की अग्नि होती है,उन्हें दूर करने के लिए शिव ने विषैले नागों की माला पहनी। दूसरी तरफ सर्प तमोगुणी है और संहारक वृत्ति का जीव है। अत: संहारिकता के प्रतीकस्वरूप शिव उसे धारण किए हुए हैं अर्थात शिव ने तमोगुण को अपने वश में कर रखा है।
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mahashivratri pooja
सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक रुद्राक्ष
रुद्राक्ष को भी शिव का श्रृंगार तत्व माना जाता है। इसका उपयोग आध्यात्मिक क्षेत्र में किया जाता है। रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शंकर की आँखों के जलबिंदु(आँसू)से हुई है, इसे धारण करने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।

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सत्य के शिव
पैरों में कड़ा
यह अपने स्थिर तथा एकाग्रता सहित सुनियोजित चरणबद्ध स्थिति को दर्शाता है। योगीजन भी शिव के समान ही एक पैर में कड़ा धारण करते हैं। अघोरी स्वरुप में भी यह देखने को मिलता है।

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सत्य के शिव - फोटो : shiv temple
खप्पर-
माता अन्नपूर्णा से शिव ने प्राणियों की क्षुधा शांति के निमित्त भिक्षा मांगी थी, इसका यह आशय है कि यदि हमारे द्वारा किसी अन्य प्राणी का कल्याण होता है, तो उसको सहायता अवश्य प्रदान करनी चाहिए।

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सत्य के शिव
व्याघ्र चर्म
शिव की देह पर व्याघ्र चर्म को धारण करने की कल्पना की गई है। व्याघ्र अहंकार और हिंसा का प्रतीक है अत: शिवजी ने अहंकार और हिंसा दोनों को दबा रखा है।
 
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सत्य के शिव - फोटो : shiv temple
डमरू
संसार का पहला वाद्य यंत्र है। इसके स्वर से वेदों के शब्दों की उत्पत्ति हुई है इसलिए इसे नाद ब्रह्म या स्वर ब्रह्म भी कहा गया है।
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