भगवान कृष्ण
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वासुदेव जब यमुना किनारे पहुंचे तो नदी ने भी उन्हें रास्ता दे दिया। पूरे मथुरा में इस समय तेज बारिश हो रही थी ऐसे में शेषनाग स्वयं शिशु के लिए छतरी बनकर वासुदेव के पीछे-पीछे चलने लगे। वासुदेव यमुना पार कर नंदगांव पहुंचे और यशोदा के साथ कृष्ण को सुला दिया और स्वयं कन्या को लेकर मथुरा गये। यह कन्या दरअसल माया का एक रूप थी। वासुदेव जैसे ही कारागार पहुंचे, सबकुछ सामान्य और पहले की तरह हो गया। कंस को आठवें संतान के जन्म की खबर पहरेदारों से मिली तो वह उसे मारने वहां आ पहुंचा। कंस ने कन्या को अपने गोद में लिया और एक पत्थर पर पटकने की कोशिश की। हालांकि, इससे पहले ही वह कन्या आकाश में उड़ गई और माया का रूप ले लिया। साथ ही उसने कहा, 'अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारने वाला तो पहले ही कहीं और सुरक्षित पहुंच चुका है।'