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Kodiyakarai: ये है वो जगह, जहां भगवान श्री राम ने किया था वानर सेना को संगठित

Tue, 06 Jul 2021 03:57 PM IST
संकल्प सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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भगवान राम - फोटो : social media
माता सीता को छुड़ाने के लिए भगवान राम ने वानरों को संगठित किया था। उन्होंने इसके लिए एक विशाल सेना का गठन किया, जिसमें अधिकांश मात्रा में वानर थे। इसी कड़ी में आज हम उस जगह के बारे में जानेंगे जहां भगवान श्री राम ने वानर सेना का गठन किया था। वानर सेना ने माता सीता को अहंकारी रावण के हाथों से छुड़ाने के लिए युद्ध में अपना अहम योगदान दिया। लंका तक जाने से लेकर रावण को परास्त करने में वानर सेना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। वानरों ने ही लंका तक जाने के लिए राम सेतु पुल का निर्माण किया। भगवान राम और रावण के बीच के इस युद्ध में कई वानर वीरगति को प्राप्त हुए। अपने इसी योगदान के चलते हिंदू धर्म में वानर जाति काफी पूज्य है। हजारों साल बाद आज के आधुनिक युग में अनुसंधानकर्ता फिर से रामायण के एक-एक परत को ढूंढ रहें है। इसी कड़ी में उन्होंने एक ऐसी जगह की पहचान की है, जहां पर भगवान श्री राम ने वानर सेना का गठन किया था। इस जगह का नाम है कोडीकरई।
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भगवान राम और माता सीता - फोटो : social media
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि हनुमान और सुग्रीव से मिलने के बाद भगवान राम ने ऋष्यमूक पर्वत पर सभी वानरों को बुलाया था। यहीं पर उन्होंने माता सीता की खोज के लिए सभी वानरों को दिशा-निर्देश दिए थे, जिसके बाद सभी वानर माता की खोज में लंका की दिशा में चल दिए थे। आगे चलकर वे सभी एक खास जगह पर रुके, जिसका नाम था कोडीकरई। कहा जाता है कि यही वह जगह थी, जहां पर भगवान राम ने वानर सेना को संगठित किया था। 
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भगवान राम और माता सीता - फोटो : social media
तमिलनाडु से एक लंबी तट रेखा गुजरती है, जिसकी लंबाई करीबन 1,000 किलोमीटर है। कोडीकरई समुद्र तट वेलांकनी में स्थित है। ये दक्षिण में पाल्क स्ट्रेट और पूर्व में बंगाल की खाड़ी से घिरा हुआ है।

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भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता - फोटो : social media
कोडीकरई में भगवान राम ने वानर सेना को संगठित किया था। यहीं उन्होंने माता सीता की खोज के लिए योजना बनाई थी और सभी वानरों के बीच उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए कार्यों का विभाजन किया था।
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भगवान राम - फोटो : Social media
राम की सेना को इस स्थान के सर्वेक्षण के बाद ही पता लगा था कि समुद्र को यहां से पार करना असंभव है। यहां से पुल भी नहीं बनाया जा सकता है। इसके बाद ही भगवान श्रीराम ने रामेश्वरम के लिए कूच किया।   
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