पद्म पुराण के अनुसार, एक बार धरती पर वज्रनाश नामक राक्षस ने उत्पात मचाया था। उसके अत्याचार बहुत ज्यादा बढ़ जाने पर ब्रह्मा जी को अंत में आकर उसका वध करना पड़ा। कथा के अनुसार जब ब्रह्मा जी उस राक्षस का संहार कर रहे थे, तब उनके हाथों से तीन जगहों पर कमल का पुष्प गिरा। जिन तीन स्थानों पर कमल गिरे वहां पर तीन झीलों का निर्माण हो गया। इस स्थान का नाम पुष्कर है। उसके बाद संसार की भलाई के लिए ब्रह्मा जी ने इस स्थान पर ही यज्ञ करने का निर्णय लिया।
जब ब्रह्मा जी यज्ञ करने के लिए पुष्कर पहुंचे तो उनकी पत्नी सरस्वती जी समय पर नहीं पहुंच पाईं। इस यज्ञ को पूर्ण करने के लिए उनकी पत्नी का वहां पर उपस्थित रहना अनिवार्य था। तब ब्रह्मा जी ने गुर्जर समुदाय की एक कन्या गायत्री से विवाह करने का निर्णय लिया। जब विवाह शुरू हुआ तो उसी समय वहां पर देवी सरस्वती भी वहां पहुंच गई। जब उन्होंने गायत्री को ब्रह्मा जी के पास बैठे हुए देखा तो वह अत्यंत क्रोधित हो गईं।
जिसके बाद उन्होंने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि एक देवता होने के बाद भी आपकी पूजा फिर कभी नहीं की जाएगी। सरस्वती जी की यह बात सुनकर सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए। इसके बाद सभी ने उनसे विनती की कि वे अपने श्राप को वापस ले ले। परंतु उन्होंने अपना श्राप वापस नहीं लिया। गुस्सा शांत होने का पश्चात सरस्वती जी ने कहा कि इस धरती पर सिर्फ पुष्कर में आपकी पूजा होगी। अगर कोई दूसरा व्यक्ति आपका मंदिर बनाएगा तो उस मंदिर का विनाश हो जाएगा। कथा के अनुसार इस कार्य में विष्णु जी ने भी ब्रह्मा जी का सहयोग किया था, जिसके कारण देवी सरस्वती ने विष्णु जी को भी श्राप दिया कि उन्हें पत्नी से विरह का कष्ट सहन करना पड़ेगा। इसी कारण जब विष्णु जी ने श्री राम का अवतार लिया तब 14 साल के वनवास के दौरान उन्हें सीता जी से विरह सहना पड़ा था।