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Garuda Purana: इन हालात में महिलाएं भी करती हैं श्राद्ध और पिंडदान, गरुड़ पुराण में है इसका उल्लेख

Wed, 14 Jul 2021 09:53 AM IST
संकल्प सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : social media
गरुड़ पुराण हिंदू धर्म में महत्वपूर्ण धार्मिक ग्रंथों में से एक है। इस ग्रंथ का संबंध भगवान विष्णु से है। इसे 18 महापुराणों में से एक माना जाता है। इसमें उन बातों का उल्लेख किया गया है, जिनका संबंध किसी दूसरे आयाम से है। जैसे मृत्यु के बाद हमारी आत्मा के साथ क्या होता है? श्राद्ध और पिंडदान करते वक्त क्या किया जाना चाहिए? और क्या नहीं किया जाना चाहिए? इन सब बातों का विस्तृत जिक्र हमें इसमें देखने को मिलता है। श्राद्ध और पिंडदान का हमारे धर्म में एक खास महत्व है। मान्यता है कि मृत्यु के बाद जिन लोगों का श्राद्ध और पिंडदान नहीं किया जाता है, उनको दूसरे लोकों में काफी ज्यादा कष्ट और दुखों का सामना करना पड़ता है।

हिंदू धर्म में लंबे समय से ये परंपरा चलती आ रही है कि श्राद्ध और पिंडदान पुरुषों के द्वारा ही किया जाता है। कई लोगों का मानना है कि ये काम महिलाएं नहीं कर सकती हैं, पर ये गलत जानकारी है। कुछ विशेष स्थितियों में महिलाएं भी श्राद्ध और पिंडदान कर सकती हैं। इसी कड़ी में आइए जानते हैं कि किन-किन परिस्थितियों में महिलाएं भी श्राद्ध और पिंडदान कर सकती हैं, जिनका उल्लेख गरुड़ पुराण में किया गया है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
ये सवाल उठता है कि जिस व्यक्ति का कोई पुत्र नहीं है, उसका श्राद्ध कौन करेगा? गरुड़ पुराण के अनुसार ऐसी स्थिति में महिलाएं अपने पितरों का श्राद्ध अथवा पिंडदान कर सकती हैं। गरुड़ पुराण में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि जिस किसी इंसान का कोई पुत्र नहीं है और उनकी संतान कन्या है। ऐसी स्थिति में कन्याएं अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध और पिंडदान करती हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
अगर कन्याएं श्रद्धापूर्वक ढंग से अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध और पिंडदान करती हैं, तो पितर उसे स्वीकार कर लेते हैं और कन्या को आशीर्वाद देते हैं। गरुड़ पुराण में कहा गया है कि बहु या फिर पत्नी भी श्राद्ध अथवा पिंडदान कर सकती हैं।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social media
वाल्मीकि रामायण में इस बात का एक जगह उल्लेख मिलता है कि वनवास के दौरान जब भगवान श्री राम, लक्ष्मण और माता सीता का पितृ पक्ष के समय गया में आगमन हुआ था। उस दौरान भगवान राम और लक्ष्मण श्राद्ध के लिए सामग्री लेने गए हुए थे। इसी बीच माता सीता को राजा दशरथ के दर्शन हुए।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
राजा दशरथ ने माता सीता से पिंडदान की कामना की थी। इसके बाद माता सीता ने वट वृक्ष, केतकी फूल और फल्गु नदी को साक्षी मानते हुए एक बालू का पिंड बनाया और उसके जरिए राजा दशरथ का पिंडदान किया। माता सीता द्वारा किए गए इस पिंडदान से राजा दशरथ खुश हुए और उन्हें आशीर्वाद दिया। इस रूप में पुत्र वधु को भी पिंडदान करने का अधिकार हमारे पौराणिक ग्रंथों में दिया गया है।
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