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चार धाम यात्रा 2019 : 10 मई को खुलेंगे बद्रीनाथ के कपाट, जानें इसे क्यों कहते हैं 'धरती का वैकुण्ठ'

Wed, 08 May 2019 02:04 PM IST
Madhukar Mishra अनीता जैन, वास्तुविद्
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Badrinath Dham Yatra 2019
नर और नारायण पर्वत श्रृंखलाओं की गोद में, अलकनंदा नदी के बायीं तरफ बसे आदितीर्थ बद्रीनाथ धाम न सिर्फ श्रद्धा व आस्था का अटूट केंद्र है, बल्कि अपने अद्वितीय प्राकृतिक सौंदर्य से भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यह तीर्थ हिंदुओं के चार प्रमुख धामों में से एक है। यह पवित्र स्थल भगवान विष्णु के चतुर्थ अवतार नर एवं नारायण की तपोभूमि है।

इस धाम के बारे में कहावत है कि-"जो जाए बद्री, वो न आए ओदरी" यानि जो व्यक्ति बद्रीनाथ के दर्शन कर लेता है, उसे माता के गर्भ में दोबारा नहीं आना पड़ता, प्राणी जन्म और मृत्यु के चक्र से छूट जाता है। ऋषिकेश से यह धाम 294 कि.मी.की दूरी पर उत्तर दिशा स्थित में है। यह पंच बद्री में से एक बद्री भी है। उत्तराखंड में पंच बद्री, पंच केदार तथा पंच प्रयाग पौराणिक व धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते है।
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Badrinath Dham Yatra 2019
आदि शंकराचार्य की रही है कर्मस्थली 

भगवान नारायण के वास के रूप में जाना जाने वाला बद्रीनाथ धाम आदि शंकराचार्य की कर्म स्थली रहा है।यह भी माना जाता है कि आदि गुरु शंकराचार्य ने 8 वीं सदी में मंदिर का निर्माण करवाया था।मंदिर के वर्तमान प्रारूप का निर्माण सोलहंवी सदी में गढ़वाल के राजा ने करवाया था । मंदिर के पुजारी शंकराचार्य के वंशज होते है जिन्हें रावल कहा जाता है। यह जब तक रावल के पद पर रहते है इन्हें ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करना होता है।

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Badrinath Dham Yatra 2019
जब खुलते हैं बंद कपाट... 

बद्रीनाथ मंदिर में भगवान विष्णु की एक मीटर ऊंची काले पत्थर (शालिग्राम) की प्रतिमा है, जिसमें भगवान विष्णु ध्यान मुद्रा में सुशोभित है। यह मंदिर तीन भागों गर्भगृह, दर्शनमण्डप और सभा मंडप में बंटा हुआ है। मंदिर परिसर में अलग-अलग देवी-देवताओं की 15 मूर्तियां विराजमान हैं। अक्षय तृतीया पर जब बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं, उस समय भी मंदिर में एक दीपक जलता रहता है, इस दीपक के दर्शन का बड़ा महत्त्व है। मान्यता है कि 6 महीने तक बंद दरवाज़े के अंदर इस दीप को देवता जलाए रखते हैं।

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Badrinath Dham Yatra 2019
धरती का वैकुण्ठ

हिमालय की तलहटी में बसे बद्रीनाथ धाम को''धरती का वैकुण्ठ'' कहा जाता है।बद्रिकाश्रम यानि ''बदरी सदृशं तीर्थम् न भूतो न भविष्यति ''अर्थात बद्रीनाथ जैसा स्थान मृत्युलोक में न पहले कभी था न भविष्य में होगा।माना जाता है कि भगवान विष्णु विग्रह रूप में यहाँ तपस्यारत हैं। यहाँ के दिव्य दर्शन करने पर मेरा अनुभव है कि भगवान विष्णु के विग्रह को एकटक निहारने पर ऐसी अनुभूति होती है जैसे सामने साक्षात भगवान विष्णु हों।मन आनंद से भावविभोर हो उठता है।
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Badrinath Dham Yatra 2019
जानें क्या चढ़ता है प्रसाद

यहां वनतुलसी की माला, चने की कच्ची दाल, गिरी का गोला और मिश्री आदि का प्रसाद चढ़ाया जाता है। वन तुलसी की महक से पूरा माहौल आनंदित हो जाता है। इस मंदिर का कई रंगों से बना प्रवेश द्वार दूर से ही पर्यटकों को आकर्षित करता है, जिसे सिंह द्वार भी कहा जाता है। मंदिर के निकट बनी व्यास और गणेश की गुफाएं हैं, जो अति सुन्दर हैं। यहीं बैठकर वेदव्यास जी ने महाभारत की रचना की थी। माना जाता हैं कि पांडव, द्रोपदी के साथ इसी रास्ते होकर स्वर्ग गए थे।
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Badrinath Dham Yatra 2019
गरम पानी के कुंड में स्नान 

मंदिर के पास ही गरम पानी के कुंड (तप्त व नारद कुंड) हैं, जिनमें श्रद्धालु नहाकर फिर दर्शन का लाभ उठाते हैं। लोगों का मानना है कि इन कुंडों में सल्फर की मात्रा अधिक होने के कारण यहां नहाने पर त्वचा संबंधी परेशानियों से छुटकारा मिल जाता है। यहाँ से तीन किलोमीटर की दूरी पर माणा गांव इंडो-तिब्बत बॉर्डर पर पड़ने वाला आखिरी गाँव है। यहाँ पर 400  फ़ीट की ऊंचाई से गिरने वाला वसुंधरा फाल्स पर्यटकों को अपनी बूंदों से भिगोकर उनका स्वागत करता है।
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Badrinath Dham Yatra 2019 - फोटो : amarujala
यहां पर शिव हुए थे ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त 

बद्रीनाथ धाम में ब्रह्मकपाल तीर्थ है, जहाँ शिव को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति मिली थी। यहां पितरों को पिंड तर्पण दिया जाता है। भगवान बद्री विशाल के मंदिर परिसर में ही मां लक्ष्मी का मंदिर है। बद्रीविशाल के दर्शन के उपरांत यहां भक्त माँ लक्ष्मी के चरणों में शीश झुकाकर उनसे आशीर्वाद लेते है। यहां ऋषिगंगा पार करने  के बाद बामड़ी गांव आता है, जहां पर श्री नारायण ने बालक रूप में बालक्रीड़ा की थी।

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जानें कहां पर होते हैं श्री हरि के चरणों के दर्शन

बद्रीनाथ मंदिर के पीछे नारायण पर्वत पर चरण पादुका तीर्थ है। यहां पर श्री हरि के चरणों के चिह्नन अंकित हैं। पुराणों में बद्रीनाथ को भारत का सबसे प्राचीन तीर्थ बताया जाता है एवं ऐसा माना जाता है कि इसकी स्थापना सतयुग में हुई थी। बद्रीनाथ मंदिर की स्थापना को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं।

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Badrinath Dham Yatra 2019
तपस्या के लिए शिव से मांगा यह स्थान

जब भगवान श्री विष्णु अपनी तपस्या के लिए उचित स्थान देखते-देखते नीलकंठ पर्वत और अलकनंदा नदी के तट पर पहुंचे, तो यह स्थान उनको अपने ध्यान योग के लिए बहुत पसंद आया। पर यह जगह तो पहले से ही शिवभूमि थी, तब विष्णु भगवान ने यहां बाल रूप धारण किया और रोने लगे। उनके रुदन को सुनकर स्वयं माता पार्वती और शिवजी उस बालक के समक्ष उपस्थित हो गए और बालक से पूछा, कि उसे क्या चाहिए। बालक ने ध्यान योग करने के लिए शिव से यह स्थान मांग लिया। भगवान विष्णु ने, शिव-पार्वती से रूप बदलकर, जो स्थान प्राप्त किया वही पवित्र स्थल आज बद्रीविशाल के नाम से प्रसिद्ध है।

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Badrinath Dham Yatra 2019
लक्ष्मीजी ने लिया बदरी वृक्ष का रूप

एक समय भगवान विष्णु तपस्या में लीन थे तो अचानक बहुत हिमपात होने लगा। तपस्यारत श्री हरि बर्फ से पूरी तरह ढकने लगे। उनकी इस दशा को देखकर माता लक्ष्मी ने वहीं पर एक विशालकाय बेर के वृक्ष का रूप धारण कर लिया और हिमपात को अपने ऊपर सहन करने लगीं। माता लक्ष्मी भगवान विष्णु को धूप, वर्षा और हिमपात से बचाने के लिए कठोर तपस्या करने लगीं। काफी वर्षों के बाद जब श्री विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया तो देखा कि उनकी प्रिया लक्ष्मी जी तो पूरी तरह बर्फ से ढकी हुई हैं। तब श्री हरि ने माता लक्ष्मी के तप को देखकर कहा-'हे देवी! तुमने मेरे बराबर ही तप किया है, इसलिए आज से इस स्थान पर मुझे तुम्हारे साथ ही पूजा जाएगा और तुमने मेरी रक्षा बदरी वृक्ष के रूप में की है अतः आज से मुझे 'बदरी के नाथ' यानि बद्रीनाथ के नाम से जाना जाएगा।'' इस तरह से भगवान विष्णु का नाम बद्रीनाथ पड़ा।

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यहां होते हैं भगवान नृसिंह के विग्रह के अद्भुत दर्शन

मान्यता है कि जोशीमठ में जहाँ शीतकाल में बद्रीनाथ की चल मूर्ति रहती है, वहां नृसिंह का एक मंदिर है। शालिग्राम शिला में भगवान नृसिंह का अद्भुत विग्रह है। इस विग्रह की बायीं भुजा पतली है और समय के साथ यह और भी पतली होती जा रही है। जिस दिन इनकी कलाई मूर्ति से अलग हो जाएगी उस दिन नर-नारायण पर्वत एक हो जाएंगे। जिससे बद्रीनाथ का मार्ग बंद हो जाएगा, कोई यहां दर्शन नहीं कर पाएगा।  
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भगवान की आधी आकृति

भविष्य बद्री, जोशीमठ से 6 मील की दूरी पर कैलास की ओर जाने वाले मार्ग पर स्थित है। यहां मंदिर के पास एक शिला है, इस शिला को ध्यान से देखने पर भगवान की आधी आकृति नज़र आती है। जब यह आकृति पूर्ण रूप ले लेगी तब यहां पर ही बद्रीनाथ के दर्शन का लाभ प्राप्त किया जाएगा। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि सतयुग में यहां भगवान विष्णु के साक्षात दर्शन हुआ करते थे।शास्त्रों में वर्तमान बद्रीनाथ यानि बद्री विशाल धाम को भगवान का दूसरा निवास स्थान बताया गया है और भविष्य में जहां भगवान का धाम होगा उसे भविष्य बद्री कहा गया है। 


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