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Masik Shivratri 2026: अप्रैल की पहली मासिक शिवरात्रि कल, जानिए शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Tue, 14 Apr 2026 06:42 PM IST
Megha Kumari ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला

सार

Masik Shivratri 2026: 15 अप्रैल 2026, बुधवार को मासिक शिवरात्रि का व्रत रखा जा रहा है। यह हिंदू पंचांग के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि है। यह महादेव को समर्पित होती है। आइए इसके महत्व को जानते हैं।
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Masik Shivratri 2026 - फोटो : अमर उजाला
Masik Shivratri 2026: पंचांग के अनुसार, प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि पर मासिक शिवरात्रि का व्रत रखा जाता है। अप्रैल माह में यह शुभ व्रत 15 अप्रैल 2026, बुधवार को रखा जा रहा है। यह दिन विशेष रूप से भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। मान्यता है कि, इस दिन सच्चे मन से उपवास रखकर शिव परिवार की पूजा करने से भोलेनाथ शीघ्र प्रसन्न होते हैं। साथ ही भक्तों के जीवन से दुख, दरिद्रता दूर करते हैं। इस बार मासिक शिवरात्रि पर प्रदोष काल में पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र के साथ ब्रह्म योग का शुभ संयोग बन रहा है, जिससे इस व्रत का महत्व और भी बढ़ गया है। ऐसे में विधि-विधान से की गई पूजा विशेष फल प्रदान कर सकती है। आइए पूजन विधि को विस्तार से जानते हैं।

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Masik Shivratri 2026 - फोटो : adobe
पूजा विधि
  • सबसे पहले शिवलिंग एवं शिव परिवार का पंचामृत से अभिषेक करें।
  • भगवान शिव को पुष्पमाला अर्पित करें और 11 बेलपत्र चढ़ाएं। 
  • ध्यान रखें कि बेलपत्र अखंड और साफ होना चाहिए।
  • अब शमी के फूल, भांग, धतूरा और मिठाई अर्पित करें।
  • ॐ नमः शिवाय मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें और शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करते रहें।
  • देसी घी का दीपक जलाकर धूप-दीप जला लें।
  • माता पार्वती को श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करें और उनका आशीर्वाद प्राप्त करें।
  • अंत में शिव-पार्वती की आरती करें और अपनी मनोकामना भगवान के चरणों में प्रकट करें।
  • पूजा के बाद अपनी सामर्थ्य अनुसार दान करें।
 

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Masik Shivratri 2026 - फोटो : adobe
निशिता काल मुहूर्त
मासिक शिवरात्रि पर निशिता काल में मुख्य रूप से पूजा की जाती है। यह समय सबसे उत्तम होता है।16 अप्रैल को रात 12:15 बजे से 01:01 बजे तक पूजा का समय रहेगा।

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Masik Shivratri 2026 - फोटो : adobe
भगवान शिव की आरती 
जय शिव ओंकारा ऊँ जय शिव ओंकारा । 
ब्रह्मा विष्णु सदा शिव अर्द्धांगी धारा ॥ 
ऊँ जय शिव...॥ 
एकानन चतुरानन पंचानन राजे। 
हंसानन गरुड़ासन वृषवाहन साजे॥ 
ऊँ जय शिव...॥ 
दो भुज चार चतुर्भुज दस भुज अति सोहे। 
त्रिगुण रूपनिरखता त्रिभुवन जन मोहे॥ 
ऊँ जय शिव...॥ 
अक्षमाला बनमाला रुण्डमाला धारी। 
चंदन मृगमद सोहै भाले शशिधारी॥ 
ऊँ जय शिव...॥ 
श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे। 
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥ 
ऊँ जय शिव...॥ 
कर के मध्य कमंडलु चक्र त्रिशूल धर्ता । 
जगकर्ता जगभर्ता जगसंहारकर्ता॥ 
ऊँ जय शिव...॥ 
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका। 
प्रणवाक्षर मध्ये ये तीनों एका॥ 
ऊँ जय शिव...॥ 
काशी में विश्वनाथ विराजत नन्दी ब्रह्मचारी। 
नित उठि भोग लगावत महिमा अति भारी॥ 
ऊँ जय शिव...॥ 
त्रिगुण शिवजीकी आरती जो कोई नर गावे । 
कहत शिवानन्द स्वामी मनवांछित फल पावे॥ 
ऊँ जय शिव...॥ 
जय शिव ओंकारा हर ऊँ शिव ओंकारा। 
ब्रह्मा विष्णु सदाशिव अद्धांगी धारा॥ ऊँ जय शिव ओंकारा...॥
 

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता और संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। 
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