हिमाचल का अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा शुरू हो गया है। भगवान रघुनाथ के चमत्कार से जुड़े इस दशहरे की कहानी बड़ी ही रोचक है। कहानी राजा को लगी एक खौफनाक बीमारी से जुड़ी है जिसे भगवान का चमत्कार ही ठीक कर पाया था। इनपुट: बलदेव राज, कुल्लू
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पानी पीते ही हुआ चमत्कार, राजा ने खुद छोड़ दिया था राजपाठ
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देवी-देवताओं का महाकुंभ कहे जाने वाले अंतरराष्ट्रीय दशहरा कुल्लू
की शुरुआत आज से करीब साढ़े तीन शताब्दी पूर्व 1650 ई. में हुई थी। इस
दौरान कुल्लू के तत्कालीन राजा जगत सिंह ने दशहरा उत्सव की इस शुरुआत की
थी।
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माना जाता है कि तत्कालीन राजा को ब्राह्मण हत्या का पाप लग गया
था। इस कारण राजा को कुष्ठ रोग हो गया। तमाम हकीम और जानकार लोगों को
दिखाने के बावजूद राजा को इस बीमारी से छुटकारा नहीं मिल पा रहा था। धीरे
धीरे राजा खौफनाक मौत की ओर बढ़ने लगा था।
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इस दौरान किसी ने राजा को
भगवान रघुनाथ के चमत्कार के बारे में बताया। राजा को बताया गया कि यदि
भगवान रघुनाथ के चरण धोकर पानी पिया जाए तो इस बीमारी से मुक्ति मिल सकती
है।
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राजा के आदेश पर अयोध्या से रघुनाथ जी की मूर्ति लाई गई। मूर्ति
को लाने के बाद राजा ने रघुनाथ के चरण धोकर पानी पिया। इससे राजा का कुष्ठ
खत्म हो गया। इसके बाद राजा ने अपना सारा राजपाठ भगवान रघुनाथ को सौंप
दिया।
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राजा स्वयं राजपाठ छोड़कर भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार बन
गए। इसी परंपरा का निर्वहन राज परिवार सदियों से कर रहा है। महेश्वर सिंह
वर्तमान में भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार हैं।
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कहा जाता है कि
रघुनाथ पहली बार ढालपुर मैदान में लाव-लश्कर के साथ पहुंचे थे। हालांकि, उस
समय जिला के कम संख्या में देवी-देवता पहुंचे थे। उसके बाद देवी-देवताओं
के मिलन का यह सिलसिला सालों से चल रहा है।
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देवी-देवता कारदार संघ
के अध्यक्ष दोतराम ठाकुर ने कहा कि भगवान रघुनाथ से जिले के सैकड़ों
देवी-देवता मिलने आते हैं। ढालपुर के अलावा मणिकर्ण, उझी घाटी के नग्गर
ठावा, हरिपुर के सरसेई में भी दशहरा मनाने की परंपरा है। इन स्थानों पर भी
भव्य शोभायात्रा के साथ सदियों से दशहरा मनाया जाता है।