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लोगों ने जमकर बरसाए एक दूसरे पर पत्थर, हिमांशु के खून से हुआ भद्रकाली का तिलक

Tue, 29 Oct 2019 10:48 AM IST
अरविन्द ठाकुर न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
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- फोटो : अमर उजाला
राजधानी शिमला से करीब 26 किलोमीटर दूर धामी (हलोग) में लोगों ने एक दूसरे पर जमकर पत्थर बरसाए। मौका था पत्थर का खेल (पत्थर का मेला) का। यह मेला यहां की अधिष्ठात्री देवी भद्रकाली को समर्पित है। इस मेले को देखने के लिए शिमला, अर्की और सुन्नी सहित दूर-दूर से हजारों लोग पहुंचे थे। भद्रकाली को समर्पित इस मेले में लोग दो गुटों में बंटकर एक दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं। इस दौरान सबसे पहले जिस व्यक्ति को पत्थर लगता है और उसके शरीर से निकलने वाले खून से यहां सती के चबूतरे पर तिलक लगाया जाता है। 
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इसके बाद सामने पहाड़ी पर स्थित मां भद्रकाली के मंदिर में तिलक की रस्म अदा की जाती है। सोमवार को भी मेले में 15 मिनट तक पत्थर का खेल चला। इस दौरान धामी हलोग के रहने वाले युवक हिमांशु कश्यप के होंठों पर पत्थर की चोट से निकले खून के साथ ही खेल को रोक दिया गया। युवक हिमांशु के अलावा डीके कश्यप और कमलेश ठाकुर को भी पत्थर से चोट लगी।
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चोटिल युवाओं के खून से पहले सती का शारड़ा चबूतरे पर तिलक किया गया और इसके बाद पहाड़ी पर बने भद्रकाली के मंदिर में ले जाकर खून से तिलक किया। चोटिल हुए हिमांशु और अन्य को तुरंत धामी सीएचसी ले जाकर उपचार दिलाया गया। हिमांशु के होंठों पर टांके लगाए हैं। धार्मिक आस्था के इस मेले में पत्थरों की होती बरसात के चलते 25 मिनट से अधिक समय तक धामी हलोग की ओर से सोलह मील और गलोग की ओर जाने वाली सड़कों पर ट्रैफिक रोक दिया था।

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मौके पर कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए पुलिस फोर्स तैनात की थी। ढोल नगाड़ों के साथ आमने-सामने से एक दूसरे पर पत्थर बरसा रहे दोनों दलों के युवा नाटी पर जमकर झूमे। इस मेले में सक्रिय रूप के राजदरबार की ओर से कटेड़ू और दूसरी ओर दूसरे दल के खूंदों ने जमकर एक दूसरे पर पत्थरों की बरसात की। दोनों और दूर दूर तक जमा लोगों की भीड़ ने मेले का भरपूर आनंद लिया।
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पत्थर लगने के बाद हिमांशु कश्यप ने कहा कि हिमाचल देव भूमि है। इसी को आगे बढ़ाने में मैं भी हिस्सा बना, इससे यह देवी-देवताओं की आस्था का खेल आगे बढ़ेगा। देव आस्था के आगे पत्थर से चोट का दर्द नाम मात्र ही महसूस हुआ। लोगों की आस्था से मामला जुड़ा है। सालभर स्थानीय लोग दिवाली के अगले दिन मनाए जाने वाले इस मेले का बेसब्री से इंतजार करते हैं। देवी-देवताओं के नाम पर यह खेल खेला जाता है।
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हलोग धामी के इस पत्थर के खेल मेले का करीब चार सौ साल पुराना इतिहास है। लोगों की इसमें अटूट आस्था है। मान्यता है कि पहले यहां नर बलि दी जाती थी। इसको रोकने के लिए इस रिसायत की रानी ने नर बलि की जगह इस पत्थर के खेल की परंपरा को शुरू किया। खेल का चौरा में रानी का चबूतरा भी बनाया गया है। धामी के उत्तराधिकारी जगदीप सिंह और देव कुरगण कमेटी के अध्यक्ष भगत राम, सचिव लेख राम वर्मा, कोषाध्यक्ष रणजीत सिंह कंवर ने बताया कि तीन बजे खेल शुरू हुआ था। इसके बाद करीब 15 मिनट तक खेल चला और पत्थर लगने की सूचना मिलने पर ही खेल रोक दिया था। यह देव आस्था से जुड़ा खेल है, इसलिए लोगों की आस्था के चलते ही इसे आगे बढ़ाया जा रहा है। 
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