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युग हत्याकांड: शातिर थे तीनों हत्यारों, इस तरह फेल करवा दिया था नार्को टेस्ट

Thu, 06 Sep 2018 04:36 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला
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युग के अपहरण और हत्या के मामले के दोषियों ने नार्को टेस्ट भी फेल कर दिया था। आरोपियों की हामी और अदालत की मंजूरी के बाद इन्हें नार्को टेस्ट के लिए गुजरात के गांधीनगर ले जाया गया था।
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उस समय यह सीआईडी की हिरासत में नहीं थे। टेस्ट वाले दिन तीनों आरोपियों ने कुछ ऐसी चीज खा ली जिससे इनका ब्लड प्रेशर बढ़ गया। 

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इस वजह से नार्को का टेस्ट टेक्निकल तौर पर असफल रहा। आरोपियों की हिरासत से पहले सीआईडी पर राजनीतिक दबाव भी रहा।

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इन्हें बेकसूर बताकर तंग न करने के लिए कहा गया लेकिन जांच टीम अपने काम में जुटी रही। सभी कड़ियों को जोड़ कर आरोपियों को गिरफ्तार कर मामले को सुलझा लिया गया।
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युग की हत्या के बाद आरोपियों ने चार बार पत्र लिखकर पीड़ित परिवार से फिरौती मांगी। फिरौती न देने पर युग को जान से मारने की धमकी देते रहे। पहला पत्र आरोपियों ने 27 जून 2014 को युग के पिता की दुकान में शटर के नीचे से डाला।
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उसके बाद फिरौती का दूसरा पत्र 4 जुलाई 2014 और तीसरा पत्र 4 अगस्त 2014 और आखिरी पत्र आठ सितंबर 2014 को भेजा। इसके बाद जब केस सीआईडी के सपुर्द हुआ तब कोई भी फिरौती का पत्र आरोपियों ने नहीं भेजा। इनमें से दो पत्र चौड़ा मैदान डाकघर और एक पत्र समरहिल डाकघर से पोस्ट किए गए थे।
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हत्यारों के मोबाइल से जो वीडियो क्लिप मिला, वही हत्यारों के गले का फंदा बन गया। दोषियों ने राम चंद्र चौक में किराये पर लिए गए कमरे में युग को प्रताड़ित करते वीडियो बनाया था। इसमें युग को कई तरह की यातनाएं देते दिखाया गया। चार साल का मासूम खुद को बचाने की गुहार लगा रहा था।

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वीडियो रिकॉर्ड करने के बाद शातिरों ने इसे डिलीट कर अपने खिलाफ  इस सबूत को खत्म समझ लिया था। लेकिन फोरेंसिक लैब ने इसे रिकवर कर लिया। वीडियो से अहम लीड मिलने के बाद ही सीआईडी ने जांच आगे बढ़ाकर आरोपियों को पकड़ा।

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युग के लापता होने के बाद परिजनों ने सदर थाने में शिकायत दी। पुलिस ने जांच शुरू की लेकिन पुलिस युग को तलाश नहीं पाई। छह से सात महीनों की जांच में पुलिस जब फेल हो गई तो केस की जांच स्टेट सीआईडी की क्राइम ब्रांच को सौंपी गई।

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केस हाथ में लेने के बाद सीआईडी ने नए सिरे से जांच शुरू की। फिरौती के लिए विनोद गुप्ता को आए पत्रों की जांच और कई सुबूत जुटाने में सीआईडी जुट गई। दो साल की गहन जांच के बाद सीआईडी के हाथ कुछ अहम सुराग लगे।

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अगस्त 2016 में सीआईडी ने पहले विक्रांत बख्शी को दबोचा। विक्रांत ने एक के बाद एक कर तमाम खुलासे किए। बाद में गुनाह में शामिल रहे चंद्र शर्मा और तेजेंद्र पाल भी गिरफ्तार किए गए।

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सीआईडी के तत्कालीन एसपी विनोद धवन की अगुवाई वाली टीम में डीएसपी धनसुख दत्ता, एएसआई अनिल कुमार, एएसआई राजेश कुमार, सब इंस्पेक्टर सुरेश कुमार, भूपेंद्र बरागटा के अलावा पीयूष, जितेंद्र कुमार, लोकेंद्र सिंह और विकास ने जांच को अंजाम तक पहुंचाया।
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शुरूआती जांच में डीएसपी विजय शर्मा, इंस्पेक्टर वीरेंद्र चौहान, हेडकांस्टेबल उमेश्वर, हेडकांस्टेबल बलबीर सहित कई कर्मचारियों की मेहनत ने दोषियों को फांसी के फंदे तक पहुंचाया।
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