घर से निकला तो राह में एक बंदगी मिली... मेरे लहू से आज किसी को नई जिंदगी मिली। 83 बार रक्तदान कर चुके 35 वर्षीय नरेश शर्मा अपना परिचय कुछ इसी अंदाज में देते हैं। 18 साल की उम्र में पहली बार रक्तदान कर एक नौजवान की जान बचाई तो कुछ ऐसा सुकून मिला कि अब आखिरी सांस तक रक्तदान को अपना मिशन बना लिया।
विज्ञापन
2 of 6
नरेश शर्मा
नरेश का ब्लड ग्रुप ओ पॉजिटिव है। परवाणू में निजी कंपनी में नौकरी करते हैं। जब कभी भी किसी को खून की जरूरत पड़ती है तो नरेश कंपनी से बाकायदा छुट्टी लेकर 100 किलोमीटर दूर तक खून देने पहुंच जाते हैं। नरेश कहते हैं- नश्वर शरीर किसी को जिंदगी दे जाए, यही इसकी सार्थकता है।
विज्ञापन
3 of 6
नरेश शर्मा
इससे उन्हें बहुत संतोष मिलता है। नरेश शर्मा मूल रूप से शिमला जिले के ठियोग क्षेत्र की सरीउन ग्राम पंचायत के मझोली गांव के निवासी हैं। नरेश ने बताया कि वर्ष 1997 में कुफरी में एक दुर्घटना हुई थी जिसमें तीन-चार लड़के घायल हुए।
4 of 6
नरेश शर्मा
तब वे भी आईजीएमसी आए और घायल लड़के को पहली बार खून दिया। तीन महीने बाद फिर उसी लड़के को रक्त दिया। वे कई शिविरों में भी खून देते हैं।
विज्ञापन
5 of 6
नरेश शर्मा
परवाणू, चंडीगढ़, मोहाली में भी रक्तदान के लिए जाते रहते हैं। 14 फरवरी को शिमला में एक शिविर में रक्तदान किया। फिर मोहाली में 28 मार्च को दिया।
इसमें एक माह का अंतराल इसलिए है क्योंकि बाद में उन्होंने थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चे को रक्त का एक सीसी ही दिया था। रक्तदान के लिए लोगों को प्रेरित करने के उद्देश्य से नरेश शर्मा को अब ‘स्टार डोनर’ के रूप में भी बुलाया जाने लगा है।