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हिमाचल के इस देवता का दिल्ली दरबार में बजा था डंका, मंदिर से जुड़ा है ये रहस्य

Mon, 25 Feb 2019 10:47 AM IST
ashok chauhan न्यूज डेस्क, अमर उजाला, शिमला/मंडी
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देवभूमि हिमाचल के प्राचीन मंदिर रहस्यों से भरे पड़े हैं। इन मंदिरों से जुड़ी देव आस्था की बातें हर किसी को हैरान कर देती हैं। रियासतकाल में भी मंडी रियासत का डंका राजधानी दिल्ली में बजा है। 
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अभिलेखों में मंडी के बड़ादेव कमरूनाग की बदौलत दिल्ली दरबार में रियासतकाल के समय मंडी के राजा जोगिंद्र सेन को राजाओं के सम्मेलन में सर्वश्रेष्ठ राजा का सम्मान दिलवाने का जिक्र है। देव समाज इससे गौरवान्वित है और शिवरात्रि पर्व में देव कमरूनाग के माधोराय दरबार में हाजरी भरने की प्राचीन रीत को आज भी बरकार है। 
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दिल्ली में शर्त रखी गई थी कि जो विशेष सिंहासन पहचानेगा वह सर्वश्रेष्ठ राजा कहलाएगा। इस पर राजा जोगिंद्र सेन ने देव कमरूनाग से मन्नत मांगी थी।  देवता ने सपने में राजा जोगिंद्र सेन को दर्शन दिए और कहा कि दिल्ली दरबार में जिस सिंहासन पर सांप दिखेगा उस सिंहासन पर आप विराजमान हो जाना। दिल्ली दरबार में ठीक वैसा ही हुआ।

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 जिसके बाद मंडी रियासत के राजा जोगिंद्र सेन को सर्वश्रेष्ठ राजा घोषित किया गया था। उपहार के रूप में राजा जोगिंद्र सेन ने देव कमरूनाग को मखमली कपड़े का सूरजपखा (पान का पता)भेंट किया था। जिस पर भगवान विष्णु की मूर्त बनाई गई है जो आज भी देवता के भंडार में स्थापित है।
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जिसके बाद देव कमरूनाग को मंडी के शिवरात्रि मेले में राजा जोगिंद्र सेन ने हर वर्ष के लिए आमंत्रित किया था। जो परंपरा आज भी जीवित है। गूर लीलामणी ने कहा कि यह पुरानी परंपरा आज भी कायम है। कमरूनाग देव का मूल स्थल नाचन विस क्षेत्र के कांढी कमरूनाग में स्थित है। 
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पहले जाता था मंडी शिवरात्रि में अकेला कमरूनाग का गूर 
राजा जोगिंद्र सेन की परंपरा से पूर्व मंडी शिवरात्रि में भाग लेने के लिए देवता का गूर जाता था। उसके बाद देवता की काहुली और एक नगाड़ा जाता था। मगर जोगिंद्र सेन राजा ने जब देवता को मखमली कपड़े का सूरजपखा भेंट किया तो उसके बाद मंदिर कमेटी ने देवता का चांदी और सोने का सूरजपखा तैयार किया। जो हर साल मंडी शिवरात्रि मेले में भाग लेने जाता है।  
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महाभारत में इस भूमिका में थे बड़ा देव कमरूनाग 
महाभारत में देव कमरूनाग रत्नयक्ष के रूप में आए थे। जो कौरवों के पक्ष में जा रहे थे। मगर भगवान कृष्ण ने उन्हें छल से हरा दिया था तथा देव कमरूनाग से उनका सिर मांगा था। जिसके बाद देव कमरूनाग ने अपना सिर भगवान कृष्ण को भेंट किया था। लेकिन रत्नयक्ष ने भगवान कृष्ण से अपनी अंतिम इच्छा में महाभारत का युद्ध देखने की मांग थी। जो भगवान कृष्ण ने सिर धड़ से अलग होने पर भी रत्नयक्ष की पूरी की थी। 
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मंदिरों में पशु बलि प्रथा पर रोक लगाने के बाद देव कमरूनाग मंडी शिवरात्रि मेले में जिला प्रशासन से रूष्ट हो गए थे।  देवता ने अपने गूर के माध्यम से खेल में तर्क दिया था कि पशु बलि मैं नहीं लेता बल्कि मेरे साथ चलने वाले गण पशु बलि लेते हैं। मगर जिला प्रशासन को बड़ी मुश्किल से देवता को मनाना पड़ा था।
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