हिमाचल का मसरूर मंदिर। इसका निर्माण और नक्काशी आज भी कारीगरों के लिए रहस्य से कम नहीं है।
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आज भी सबके लिए रहस्य है हिमाचल का ये मंदिर
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कहा जाता है कि इस मंदिर को बनाने में 100 साल से भी ज्यादा का वक्त लग गया था। मंदिर रहस्यमयी है। आज तक कारीगर इस तरह की कलाकृति को बनाने की कला का पता नहीं लगा पाए।
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मंदिर किसने और किन कारीगरों ने बनाया, इसका आजतक किसी को पुख्ता जानकारी नहीं है। कहा जाता है कि मंदिर के निर्माण में जो नक्काशी इस्तेमाल की गई है वह सातवीं शताब्दी में पल्लव किंग नरसिंह वर्मन प्रथम के समय की लगती है। इसका निर्माण दक्षिण भारत के कई मंदिरों के साथ किया गया था।
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मसरूर का यह विश्वविख्यात मंदिर हिमाचल के कांगड़ा से 32 किलोमीटर दूर है। यहां हर साल लाखों श्रद्घालु पहुंचते हैं। मंदिर के मुख्य गेट से लेकर सभी दीवारों पर दुर्लभ नक्काशी आज भी मौजूद है।
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यह एक 15 स्थिर और मजबूत चट्टानों का एक समूह था जिसे कारीगरों ने काटकर मंदिर की शक्ल दे दी। इन चट्टानों में इंडो आर्यन स्टाइल की नक्काशी की गई है। उतर भारत में यह इकलौता मंदिर है जिसका निर्माण चट्टानों को काटकर किया गया है।
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मुख्य मंदिर पर भगवान श्रीराम राम, लक्ष्मण और सीता की छवियां अंकित की गई हैं। साथ ही भगवान शिव की भी एक कलाकृति यहां है। यह मंदिर भगवान शिव को ही समर्पित है।
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मसरूर मंदिर का करीब 2500 फीट की ऊंचाई पर स्थित पहाड़ियों पर बनाया गया है। इन्हें विश्व के अजूबों में से एक माना जाता है। मंदिर के आगे एक बड़ा तालाब भी है जो इसकी खूबसूरती को चार चांद लगाता है।
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आर्किटेक्चर मानते हैं कि चट्टानों को काटकर इस तरह का निर्माण करना बेहद मुश्किल होता है। ऐसे में इस मंदिर का निर्माण उस समय के सबसे बेहतरीन कारीगरों से करवाया गया था। आज के जमाने में ऐसा निर्माण संभव नहीं हो सकता।
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हालांकि बाहरी आक्रमण और 1905 को आए भूकंप के कारण मंदिर ने अपनी सुंदरता भी खोई है। मगर आज यहां कुछेक ही ऐसे हैं जो अपनी खूबसूरती बरकरार रखे हुए हैं। मंदिर के कुछेक हिस्से स्टेट म्यूजियम शिमला में भी रखे गए हैं।