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जिसने भी यहां चढ़ने की हिम्मत की वो 'पत्थर' बन गया

Sun, 17 May 2015 05:59 PM IST
टीम डिजीटल/ अमर उजाला, शिमला
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हमेशा बर्फ से ढके रहने वाले इस पौराणिक पर्वत पर जिसने भी चढ़ने की कोशिश की वह पत्थर बन गया। यकीन मानिए आज भी इस पर्वत की चोटी तक पहुंचने की कोई हिम्मत नहीं जुटा पाया है। जानिए क्या है यहां का सच..


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जिसने भी यहां चढ़ने की हिम्मत की वो 'पत्‍थर' बन गया

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जी हां यह पूरी तरह से सच है कि पांच कैलाशों में से एक मणिमहेश पर्वत पर जिसने भी चढ़ने की कोशिश की वह पत्‍थर बन गया। हालांकि कुछ कैलाशों में पर्वत की चोटी तक यात्रा की जाती है। मगर यहां ऐसा संभव नहीं है।

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स्‍थानीय लोगों की मान्यता है कि एक बार गडरिया अपनी भेड़ों के साथ मणिमहेश पर्वत की चोटी पर चढ़ने लगा। मगर जैसे जैसे वह ऊपर की ओर चलता गया, उसकी सभी भेड़ें एक-एक करके पत्‍थर बनती गईं। इसके बाद भी जब गडरिया नहीं माना तो आखिरकार वह भी शिला में तबदील हो गया।

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हिमाचल प्रदेश के चंबा जिला के भरमौर में स्थित मणिमहेश को टरकोईज माउंटेन के नाम से भी पुकारा जाता है, जिसका अर्थ है वैदूर्यमणि या नीलमणि। समुद्र तल से 18500 फीट की ऊंचाई पर स्थित मणिमहेश को भगवान शिव और मां पार्वती का निवास स्थान माना जाता है।
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कहा जाता है कि वर्ष 1968 में भी इस पर्वत पर एक पर्वतारोही ने चढ़ने की कोशिश की मगर वह सफल नहीं हुआ। हालांकि उसके पत्‍थर बनने के कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं। मगर बावजूद इसके आज तक मणिमहेश पर्वत पर चढ़ने की कोई हिम्मत नहीं जुटा पाया है।

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वैसे तो मणिमहेश यात्रा के प्रमाण सृष्टि के आदिकाल से मिलते हैं। मगर 520 ईस्वी में भरमौर नरेश मरू वर्मा द्वारा भगवान शिव की पूजा अर्चना के लिए ‌मणिमहेश यात्रा का उल्लेख मिलता है। मगर मौजूदा यात्रा का संबंध 1920 से बताया जाता है। उस समय मरु वंश के वशंज राजा साहिल वर्मा (शैल वर्मा) भरमौर के राजा थे।
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उनकी कोई संतान नहीं थी। एक बार चौरासी योगी ऋषि इनकी राजधानी में पधारे। राजा की विनम्रता और आदर-सत्कार से प्रसन्न हुए इन 84 योगियों के वरदान के फलस्वरूप राजा साहिल वर्मा के दस पुत्र और चम्पावती नाम की एक कन्या को मिलाकर ग्यारह संतान हुई। इस पर राजा ने इन 84 योगियों के सम्मान में भरमौर में 84 मंदिरों के एक समूह का निर्माण कराया, जिनमें मणिमहेश नाम से शिव मंदिर और लक्षणा देवी नाम से एक देवी मंदिर विशेष महत्व रखते हैं। यह पूरा मंदिर समूह उस समय की उच्च कला-संस्कृति का नमूना आज भी पेश करता है।

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राजा साहिल वर्मा ने अपने राज्य का विस्तार करते हुए चम्बा (तत्कालीन नाम- चम्पा) बसाया और राजधानी भी भरमौर से चम्बा में स्थानांतरित कर दी। उसी समय चरपटनाथ नाम के एक योगी भी हुए। गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित कल्याण पत्रिका के शिवोपासनांक में छपे एक लेख के अनुसार मणिमहेश-कैलाश की खोज और पारंपरिक वार्षिक यात्रा आरंभ करने का श्रेय योगी चरपटनाथ को जाता है। तभी से लगभग दो सप्ताह के मध्य की जाने वाली यह वार्षिक यात्रा श्रीकृष्ण जन्माष्टमी (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी) से श्रीराधाष्टमी (भाद्रपद शुक्ल अष्टमी) के मध्य आयोजित की जाती है।

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यह हडसर (प्राचीन नाम हरसर) नामक स्थान से शुरू होती है। यहां से आगे पहाड़ी मार्ग ही एकमात्र माध्यम है जिसे पैदल चलकर या फिर घोड़े-खच्चरों की सवारी द्वारा तय किया जाता है। किसी समय में पैदल यात्रा चंबा से आरम्भ होती थी। सड़क बनने के बाद यात्रा भरमौर से आरंभ होने लगी। अब यह साधारण तौर पर यात्रा हडसर से आरंभ होती है। मगर यहां के स्थानीय ब्राह्मणों साधुओं द्वारा आज भी पारंपरिक छड़ी यात्रा प्राचीन परंपरा के अनुसार चंबा के ऐतिहासिक लक्ष्मीनारायण मंदिर से ही आरंभ होती है। हडसर से मणिमहेश-कैलाश की दूरी लगभग 15 किलोमीटर है जिसके मध्य में धन्छो नामक स्थान पड़ता है। जहां भोजन व रात्रि विश्राम की सुविधा उपलब्ध होती है।

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धन्छो से आगे और मणिमहेश सरोवर से दो किलोमीटर पहले गौरीकुंड आता है। यात्रा के दौरान गैर सरकारी संस्थानों द्वारा यात्रियों के लिए नि:शुल्क लंगर सेवा उपलब्ध करवाई जाती है। गौरीकुंड से करीब डेढ़ किलोमीटर पर स्थित है मणिमहेश-सरोवर आम यात्रियों व श्रद्धालुओं के लिए यही अंतिम पड़ाव है। ध्यान देने की बात है कि कैलाश के साथ सरोवर का होना सर्वव्यापक है। तिब्बत में कैलाश के साथ मानसरोवर है तो आदि-कैलाश के साथ पार्वती कुंड और भरमौर में कैलाश के साथ मणिमहेश सरोवर।

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यहां पर भक्तगण सरोवर के बर्फ से ठंडे जल में स्नान करते हैं। फिर सरोवर के किनारे स्थापित श्वेत पत्थर की शिवलिंग रूपी मूर्ति (जिसे छठी शताब्दी का बताया जाता है) पर अपनी श्रद्धापूर्ण पूजा अर्चना अर्पण करते हैं। मणिमहेश सरोवर से पूर्व दिशा में स्थित विशाल और गगनचुंबी नीलमणि के गुण धर्म से युक्त हिमाच्छादित कैलाश पर्वत के दर्शन होते हैं।

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कैलाश पर्वत के शिखर के ठीक नीचे बर्फ से घिरा एक छोटा-सा शिखर पिंडी रूप में दृश्यमान होता है। स्थानीय लोगों के अनुसार यह भारी हिमपात होने पर भी हमेशा दिखाई देता है। इसी को श्रद्धालु शिव रूप मानकर नमस्कार करते हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार वसंत ऋतु के आरंभ से और वर्षा ऋतु के अंत तक छह महीने भगवान शिव सपरिवार कैलाश पर निवास करते हैं। इसके बाद शरद् ऋतु से लेकर वसंत ऋतु तक छह महीने कैलाश से नीचे उतर कर पतालपुर (पयालपुर) में निवास करते हैं।

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इसी प्रकार फागुन मास में पड़ने वाली महाशिवरात्रि पर आयोजित मेला भगवान शिव की कैलाश वापसी के उपलक्ष्य में आयोजित किया जाता है। पर्यटन की दृष्टि से भी यह स्थान अत्यधिक मनोरम है। इस कैलाश पर्वत की परिक्रमा भी की जा सकती है, लेकिन इसके लिए पर्वतारोहण का प्रशिक्षण व उपकरण अति आवश्यक हैं।

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सालाना मणिमहेश यात्रा हडसर नामक स्थान से शुरू होती है जो भरमौर से लगभग 17 किलोमीटर, चम्बा से लगभग 82 किलोमीटर और पठानकोट से लगभग 220 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पंजाब में पठानकोट मणिमहेश-कैलास यात्रा के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन है जो दिल्ली-उधमपुर मुख्य रेलमार्ग पर है। यहां आने के लिए निकटतम हवाई अड्डा कांगड़ा जिला में है। हडसर हिमाचल राज्य परिवहन की बसों द्वारा भलीभांति जुड़ा हुआ है। पड़ोसी राज्यों व दिल्ली से भी चम्बा तक की सीधी बस सेवा उपलब्‍ध है।
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पैदल मार्ग भी शिव के पर्वतीय स्थानों के साथ जुड़ी हुई शर्त है। कैलाश, आदि कैलाश या मणिमहेश कैलाश सभी दुर्गम बर्फीले स्थानों पर हैं। इसलिए यहां जाने वालों के लिए न्यूनतम सेहत तो चाहिए ही। इसके साथ ही श्रद्धालुओं को जरूरी गर्म कपड़े व दवाएं भी हमेशा साथ रखनी चाहिए। मणिमहेश झील के लिए सालाना यात्रा के अलावा भी जाया जा सकता है। मई, सितंबर व अक्टूबर का समय इसके लिए उपयुक्त है।
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