क्या आप दहकते अंगारों पर चल सकते हैं? नहीं न। यकीन मानिए हिमाचल के सिरमौर के वियोंग और गत्ताधार गांव में ऐसा हुआ है। लोग दहकते अंगारों पर कूदे ही नहीं बल्कि घंटों तक नाचते भी रहे और उनके पांव को आंच तक नहीं आई। सुनने में यह अटपटा जरूर लगता है, लेकिन है सौ फीसदी सच।
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दरअसल गांव में भाद्रपद मास की पंचमी पर महासू देवता के सम्मान में पांजवी उत्सव मनाया जाता है। रातभर भजन-कीर्तन के दौर के बीच जैसे ही प्राचीन महासू देवगीत गा उठते हैं तो देवखेल में भक्त आग पर कूदने लगते हैं। मंगलवार की रात वियोंग और गत्ताधार में यह नजारा देखने को मिला। यह नजारा देख देवशक्ति के आगे सब नतमस्तक हो गए।
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इस देव उत्सव को लेकर गांव के बुजुर्ग, बच्चे भारी संख्या में पहुंचे। यहां तक कि अन्य गांवों के लोगों का भी यहां जमावड़ा लगा रहा। उत्सव के दौरान महासू भक्तों में देवशक्ति आने पर वह दहकते आग के शोलों से खेलने लगे।
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सांयकाल होते ही ग्रामीण महासू देवता के प्रांगण में एकत्रित हुए। वहां पर मोटी-2 लकड़ियों का अलाव जलाया। उसके उपरांत वहां पर पहाड़ी नाटियों का दौर शुरू हुआ। रात करीब 10 बजे जैसे ही महासू देवता का प्रिय गीत ‘बिरसू बोरमी न जाई रे देवा बोरमी न जाई...’शुरू हुआ तो नाटी डालने वाले लोग तितर-बितर हो गए। इस दौरान कई लोग नाचते हुए वहां दहक रही आग में कूद पड़े।
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घंटों तक बारी-बारी लोग नाचते रहे। मान्यता है कि वह ऐसा तभी करते हैं जब उनके शरीर में देवता प्रवेश करते हैं। यह सिलसिला रात को तीन-चार बार चला। सुबह के वक्त देवभक्त अग्नि को भक्तों ने अपने नंगे पांव से ही मसल दिया। हैरत यह है कि इस दौरान नाचने वालों के पांव में आंच तक नहीं आई।
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गांव के मुखिया सूरतराम शर्मा, चंदन शर्मा, पूर्व प्रधान बिलम सिंह, बलदेव, सुरेश शर्मा, आदि ने बताया कि यह परंपरा जब गांव बसा होगा तब से है। उन्होंने बताया कि पंचमी से दो दिन पूर्व देवता की छड़ी को पंजाह, टटवा, टिकरी गांव में घुमाया जाता है जिसमेें गांव के लोग नया अनाज देवता को प्रदान करते हैं।
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यह उत्सव महासू देवता के जन्म दिवस के रूप में मनाया जाता है। ग्रामीणों की मानें तो इस उत्सव के दिन पहले बकरे की बलि होती थी, लेकिन अब इसके स्थान पर गुड़ की भेली दी जाती है। बलि प्रथा को बंद कर दिया गया है।