रामपुर बुशैहर का लवी मेला पिछले 333 वर्षों से बदस्तूर चल रहा है। यहां पर सदियों से लोग सामान की खरीददारी और बेचने के लिए पहुंचते हैं।
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देखिए 333 साल पुरानी परंपरा जो आज भी निभाई जा रही है
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मेले में ऊनी कपड़े, पीतल के बर्तन, औजार, बिस्तर, मेवे, शहद, सेब, न्योजा, सूखी खुमानी, अखरोट, ऊन, पशम का जमकर कारोबार हो रहा है। विभिन्न नस्लों के घोड़े बिक रहे हैं।
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पारंपरिक वेशभूषा की तस्वीर पेश करने के लिए जहां लोक संगीत के लिए सांस्कृतिक दल यहां पहुंचे हैं, वहीं व्यापारियों ने भी मेले में डेरा डाल दिया है।
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उत्तरी क्षेत्र में एक पारंपरिक कोटनुमा ऊनी वस्त्र पहना जाता है। इसे लोइया कहा जाता है और इसी लोइया के कारण मेले का नाम लवी पड़ा। लवी का मेला सतलुज के किनारे बसे रामपुर में आयोजित किया जाता है।
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लवी मेले में हिमाचल के दुर्गम क्षेत्रों में बनाई जाने वाली शॉल सहित टोपियों और अन्य सामान भी मिलता है।
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मेले में पहाड़ी संस्कृति की झलक भी देखने को मिलती है। यहां लोग बुशैहरी टोपियां पहनते हैं जो कि काफी आकर्षक लगती है।