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कारगिल शौर्य गाथा 20 साल बाद भी पाठ्यक्रम में शामिल न होने का ब्रिगेडियर को है मलाल

Fri, 26 Jul 2019 11:59 AM IST
Krishan Singh रोशन ठाकुर, अमर उजाला, कुल्लू
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कारगिल विजय दिवस
दुनिया के सबसे चुनौतीपूर्ण युद्धों में शुमार कारगिल युद्ध को फतह करने के पल आज भी जेहन में हैं। इस जीत में हिमाचल के जांबाजों समेत भारतीय सेना के जवानों की भूमिका अदम्य साहस की मिसाल है, लेकिन कारगिल शौर्य गाथा को पाठ्यक्रम में शामिल न करने का मलाल भी है।
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- फोटो : अमर उजाला
कारगिल युद्ध में सबसे मुश्किल टाइगर हिल और प्वाइंट 4875 का मोर्चा संभालने वाली 18 ग्रेनेडियर के तत्कालीन कमान अधिकारी ब्रिगेडियर खुशाल ठाकुर ने युद्ध की यादें साझा करते कहा कि शहीदों के प्रति सरकार और समाज को संवेदनशील होना चाहिए। सबसे मुश्किल कारगिल युद्ध को जीतने की शौर्य गाथा को स्कूल और कॉलेज के शिक्षा पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए।
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- फोटो : अमर उजाला
विद्यार्थियों को बताया जाना चाहिए कि कैसे भारतीय जांबाजों ने सरहद की निगहबानी की। शहीदों के परिजनों को जितना भी सम्मान मिले, कम है। यही बात परमवीर चक्र विजेता शहीद कैप्टन विक्रम बतरा के परिजनों ने भी कही। इस बाबत कैप्टन बतरा के पिता जीएल बतरा ने मोदी सरकार को एक साल पहले पत्र भी लिखा, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

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जेएंडके के द्रास में शहीद स्मारक पर विजय दिवस की तैयारियों में व्यस्त ब्रिगेडियर ठाकुर ने फोन पर बताया कि 14 जुलाई को दिल्ली से चली विजय ज्योति मशाल 26 जुलाई को द्रास पहुंचेगी। तीनों सेना के अध्यक्षों के साथ देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद इस भव्य कार्यक्रम में भाग लेंगे। युद्ध में देश भर के कई वीर सपूतों ने शहादतें दीं। इनमें 52 हिमाचली शामिल थे। युद्ध में शामिल ज्यादातर हिमाचली जवान 30 साल से कम उम्र के थे।
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उनकी यूनिट 18 ग्रेनेडियर के 34 जांबाजों ने शहादत का जाम पिया। इनमें 2 अफसर, 2 जेसीओ और 30 जवान शामिल थे। सबसे गौरवमयी पल चार जुलाई को आया, जब उनके नेतृत्व में भारतीय वीरों ने टाइगर हिल पर तिरंगा फहराया। इस युद्ध में कांगड़ा जिला के 15, मंडी से 11, हमीरपुर के सात, बिलासपुर के सात, शिमला से चार, ऊना से दो, सोलन और सिरमौर से दो-दो तथा चंबा और कुल्लू से एक-एक जवान ने कुर्बानी दी थी।
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- फोटो : अमर उजाला
अपने प्राणों की आहुति देने वाले शहीद डोला राम का परिवार अनदेखी का शिकार हो रहा है। कुल्लू जिले की उपतहसील नित्थर के शकरोली गांव के डोला राम ने 3 जुलाई को शहादत पाई थी। डोला राम की पत्नी प्रेमा देवी के अनुसार जब उनके पति शहीद हुए थे तो तत्कालीन केंद्र सरकार ने शहीद परिवार के सदस्यों को दो सरकारी नौकरियां देने का वादा किया था। एक नौकरी प्रदेश सरकार और दूसरी केंद्र की ओर से दी जानी थी, लेकिन केंद्र से नौकरी नहीं मिली। प्रेमा ने कहा कि अब उसके बच्चे पढ़-लिखकर बड़े हो गए हैं, इसलिए केंद्र से नौकरी मिलनी चाहिए।
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