पहाड़ पर उगने वाली गुच्छी आज भी वैज्ञानिकों के लिए रहस्य बनी हुई है। ये कैसे उगती है, इसका बीज कैसे तैयार किया जाए, ये सारे सवाल आज भी ज्यों के त्यों है। दूसरा गुच्छी हर किसी को दिखाई नहीं देती। लोग मानते हैं कि गुच्छी भाग्य से जुड़ी है। कई लोगों को तो मुंह के सामने उगी गुच्छी भी दिखाई नहीं देती।
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बेहद चौंकाने वाली हैं गुच्छी से जुड़ी ये खास बातें
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गुच्छी का वैज्ञानिक नाम मार्किला एस्क्यूपलैंटा है लेकिन इसे हिंदी में स्पंज मशरूम कहते हैं। पहाड़ पर नमी वाले स्थानों में उगने के कारण पहाड़ी लोग इसे डूंगलू या गुच्छी कहते हैं। ये लाल, भूरे और काले रंग की होती है।
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गुच्छी सिर्फ प्राकृतिक तौर पर उगती है। इसकी खेती करने में अभी वैज्ञानिकों को सफलता नहीं मिली है। इसके न तो आज तक बीज तैयार हो पाए और न ही उगाने की कोई और विधि का पता चल पाया। यही कारण है कि इसकी कीमत 20 से 30 हजार रुपए प्रति किलो तक है।
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वैज्ञानिकों के अनुसार गुच्छी में कार्बोहाईड्रेट की मात्रा शून्य होती है। यह हृदय रोग, नियूरेपिक, मोटापा और सर्दी-जुखाम जैसी बीमारियों से लड़ने में रामबाण साबित होती है। इसका इस्तेमाल कई घातक बीमारियों को ठीक करने वाली दवाइयों के निर्माण में भी होता है। इसीलिए डॉक्टर भी इसे संजीवनी मानते हैं।
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गुच्छियां जंगलों में प्राकृतिक तौर पर उगती है। कुदरत ने न तो इसका बीज बनाया है और न ही उपयुक्त स्थान। फरवरी से लेकर अप्रैल माह में मौसम पर आसमानी बिजली कड़कने से जंगल में गुच्छियां अपने आप उगती है। इसकी अवधि भी बेहद कम होती है। कुछ ही दिनों में ये सूख जाती है। जंगली पक्षियों का ये अहम भोजन है।
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गुच्छियों के बारे में एक और बड़ी दिलचस्प बात यह है कि जो लोग इसे जंगलों में ढूंढने निकलते हैं, उनमें कई लोगों को यह दिखाई तक नहीं देती। इसे भाग्य से जोड़ा जाता है। कई लोग ऐसे भी हैं जिन्हें एक ही जगह पर काफी मात्रा में गुच्छी मिल जाती है।
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पहाड़ी इलाकों में बारिश के तुरंत बाद लोग घरों से इसकी तलाश में निकल पड़ते हैं। हिमाचल में कुल्लू, शिमला के उपरी इलाकों, सोलन, सिरमौर में कई लोग इसे बेचकर लाखों रुपया तक कमा लेते हैं।
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अब तक हिमाचल आने वाले सैलानी भी इसके मुरीद हो रहे हैं। कुल्लू-मनाली में सैर सपाटे के लिए आ रहे सैलानियों की पहली पसंद भी गुच्छी बनी हुई है। होटलों में इसकी स्पेशल डिश भी बनती है मगर ये काफी महंगी होती है।