पहाड़ के बीचोंबीच बसे शिलाई गांव और बाजार पर एक राक्षस की बुरी नजर थी। इसी कारण यहां अक्सर किसी व्यक्ति या सफेद रंग के पशु की मौत हो जाती थी। ये कोई कहानी नहीं है। गांव के लोग आज भी इस बात पर यकीन करते हैं।
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यहां गुग्गा जाहरवीर ने किया ऐसा चमत्कार कि डरकर भागे राक्षस
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कहते हैं कि साथ लगती उत्तराखंड की सीमा पर स्थित दोशोऊ में एक दानव की नजर शिलाई के इस बाजार और गांव पर पड़ती थी। इस जगह को उस समय धार अड़िया से जाना जाता था।
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यहां गुग्गा जाहरवीर ने किया ऐसा चमत्कार कि डरकर भागे राक्षस
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दानव की नजर से यहां किसी एक व्यक्ति और सफेद रंग के पशु की मौत हो जाती थी। यह सिलसिला काफी सालों तक जारी रहा। इसके अलावा यदि कोई भी यहां के जंगलों से होकर गुजरता तो उसकी भी जान चली जाती थी।
यहां गुग्गा जाहरवीर ने किया ऐसा चमत्कार कि डरकर भागे राक्षस
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लोगों ने इस बारे में पूरी पड़ताल की। बाद में गणिकाओं ने बताया कि इस क्षेत्र पर दानव की बुरी नजर पड़ गई है। इसे रोकने के लिए यहां गुग्गा जाहरवीर का मंदिर बनाया जाना चाहिए।
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यहां गुग्गा जाहरवीर ने किया ऐसा चमत्कार कि डरकर भागे राक्षस
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लोगों ने गणिकाओं के बताए अनुसार कई मुश्किलों के बाद यहां पर मंदिर बनवा दिया। कहते हैं देवता के प्रभाव से राक्षस यहां से डरकर भाग गए और ये इलाका खुशहाल होने लगा।
यहां गुग्गा जाहरवीर ने किया ऐसा चमत्कार कि डरकर भागे राक्षस
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शिलाई हिमाचल के जिला सिरमौर में पड़ता है। आज भी यहां गुग्गा नवमी की रात को मंदिर के बाहर अलाव जलाकर दानव के दोष को रोका जाता है। वहीं, प्राचीन देवता गुग्गा जाहरवीर क्षेत्र के 52 गांवों के भ्रमण करते हैं। देवता की यह यात्रा रक्षाबंधन के दिन वाद्य यंत्रों के साथ शुरू होती है। देवता सभी गांवों का भ्रमण करने के बाद कृष्ण जन्माष्टमी से ठीक एक दिन पहले वापस शिलाई गुग्गामाड़ी मंदिर पहुंच जाते हैं।