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Himachal Election: घोड़ा न गाड़ी, मीलों पैदल चलकर चुनाव प्रचार करते थे डॉ. परमार, देखें तस्वीरें

Thu, 03 Nov 2022 10:34 AM IST
अरविन्द ठाकुर हितेश शर्मा, संवाद न्यूज एजेंसी, नाहन (सिरमौर)
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1972 में एक दौरे के दौरान डॉ. वाईएस परमार। - फोटो : संवाद
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ये अफसर यहां पैदल नहीं चल पाएंगे। ये घोड़े इन अधिकारियों को दे दो। मैं पैदल ही चला। ये उस जमाने की बात है जब हिमाचल निर्माता डॉ. वाईएस परमार कभी किसी गांव के दौरे पर निकलते थे। वह कहते थे कि जब तक अधिकारी घोड़ों से पहुंचेंगे, वह अपना काम भी निपटा लेंगे। होता भी कुछ ऐसा ही था। अधिकारी के घोड़े पर पहुंचने तक डॉ. परमार मीलों का सफर पैदल तय करने के बाद गांव में जनसभा भी खत्म कर चुके होते थे। जहां तक चुनावी प्रचार की बात है तो डॉ. परमार ने ऐसे समय में भी कभी घोड़े पर जाकर प्रचार नहीं किया। 
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972 में श्री रेणुका जी विस क्षेत्र के चाड़ना में लोगों को संबोधित करते डॉ. वाईएस परमार। - फोटो : संवाद
फिर, प्रचार चाहे जिला सिरमौर में हो या हिमाचल के किसी भी हिस्से में। हिमाचल के पहले मुख्यमंत्री डॉ. यशवंत सिंह परमार के सुपुत्र एवं पूर्व विधायक कुश परमार ने बताया कि उन्हें अच्छी तरह याद है उनके पिता 30 मील तक का सफर एक दिन में ही तय कर लेते थे। कभी घोड़े पर सफर नहीं किया। यहां तक कि सरकारी कार्यक्रम के दौरान भी वह अधिकारियों के लिए घोड़े रखते थे। चुनाव प्रचार के दौरान साथ कुछ लोग ही उनके साथ चलते थे, लेकिन गांव में उन्हें देखने के लिए हजारों की भीड़ उमड़ती थी। उनकी सादगी का हर कोई कायल था।
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1972-75 के बीच प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दौरे के दौरान डॉ. वाईएस परमार। - फोटो : संवाद
इंदिरा गांधी के संदेश मात्र से ही डॉ. परमार ने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था। यह सियासी घटनाक्रम 1976 का है। त्यागपत्र देने से तीन दिन पहले वे दिल्ली थे। वापस आकर नाहन में बैठक कर रहे थे कि तभी शिमला कार्यालय से सूचना मिली कि उन्हें दिल्ली बुलाया है। सोचने लगे कि कल ही तो वहां से आए हैं। ऐसा क्या हुआ जो फिर...। बहरहाल, वे दिल्ली रवाना हो गए। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के आवास पर गए तो वहां कांग्रेस महासचिव पूर्वी मुखर्जी से बात हुई। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री चाहती हैं कि वे मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दें। डॉ. परमार मुस्कुराए और कहा बस इतनी सी बात’। मुझे फोन पर ही बता देते और वापस चलने लगे। कहा कि कल मंडी में मेरी जनसभा है। इसके बाद त्यागपत्र दे दूंगा। डॉ. परमार ने पद छोड़ा और ठाकुर रामलाल को गद्दी सौंपी गई।

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लाहौल-स्पीति के कुंजुम दर्रे में पीएम इंदिरा गांधी, डॉ. वाईएस परमार, वीरभद्र सिंह और ठाकुर रामलाल । - फोटो : संवाद
25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 तक यानी करीब चार महीने चुनाव प्रक्रिया चली। इस चुनाव प्रक्रिया ने भारत को एक नए मुकाम पर लाकर खड़ा किया। अंग्रेजों ने देश को कंगाल जरूर किया था, लेकिन इसके बावजूद स्वतंत्र भारत ने स्वयं को विश्व के घोषित लोकतांत्रिक देशों की कतार में खड़ा कर दिया।  
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डॉ. वाईएस परमार - फोटो : संवाद
डॉ. वाईएस परमार का सफर  
- डॉ. परमार का जन्म 4 अगस्त 1906 को चन्हालग गंाव में हुआ। 
- 1922 में मैट्रिक। 1926 में लाहौर से स्नातक के बाद 1928 में लखनऊ के कैनिंग कॉलेज से एमए और एलएलबी की पढ़ाई की। 
- 1944 में लखनऊ विश्वविद्यालय से पीएचडी की। 
- 1930 से 1937 तक सिरमौर रियासत के सब जज और 1941 में सिरमौर रियासत के सेशन जज रहे। 1943 में इस पद से इस्तीफा दिया। 
- 1946 में डॉ. परमार हिमाचल हिल्स स्टेटस रीजनल काउंसिल के प्रधान चुने गए। 
- 1947 में प्रजामंडल सिरमौर के प्रधान रहे। 
- 1948 से 1950 तक अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य रहे। 
- 1950 में हिमाचल कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने। 
- डॉ. परमार 1952 में प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री बने। 
- 1957 में संसद सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए। 
- 1963 में दोबारा प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 
- 24 जनवरी, 1977 को उन्होंने मुख्यमंत्री पद से त्याग पत्र दे दिया।
- 2 मई 1981 को निधन।
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