भीषण आग से आधी रात को शिमला का तांगणू गांव चीख-पुकार से गूंज पड़ा। हर ओर अफरातफरी मच गई। बर्फबारी के बीच बेघर हुए लोगों के पास अब रहने और खाने को कुछ नहीं है। तेज हवाओं के बीच आग ने पूरे गांव को अपनी आगोश में ले लिया। किसी को संभलने का मौका नहीं मिला।
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जान बचाने के लिए कोई बच्चों तो कोई बुजुर्गों-बीमारों को पीठ पर उठाकर खुले की ओर दौड़ा। रात भर घरों को धू-धू कर जलता देख बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग रोते-बिलखते रहे। सुबह होते-होते हंसता खेलता 52 परिवारों का गांव राख के ढेर में तब्दील हो गया।
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आग ने जो तबाही बरपाई, उससे पूरा गांव दाने-दाने के लिए मोहताज हो गया। घरों में नकदी, कपड़े, अनाज, बिस्तर, चारपाई सब कुछ जलकर राख हो गया। न खाने को कुछ बचा है और न ही बर्फबारी से बचने को कपड़े।
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प्रशासन ने ग्रामीणों को एक-एक तिरपाल दी है, लेकिन बर्फ के बीच तिरपाल के नीचे रात गुजारना आसान नहीं। करीब नौ हजार फीट की ऊंचाई वाले तांगणू गांव में भारी बर्फबारी होती है, जिसकी चिंता ग्रामीणों को सता रही है।
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बर्फबारी में तिरपाल के नीचे बच्चों, बुजुर्गों और बीमारों के साथ रहना आसान नहीं। पीड़ित ग्रामीण अब नम आंखों से सरकार और प्रशासन की ओर देख रहे हैं। घटना की रात ग्रामीण अपने अपने घरों को बचाने का प्रयास करते रहे।
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समीपवर्ती गांव से भी ग्रामीण आग बुझाने पहुंचे, लेकिन कामयाब नहीं हो पाए। रविवार को ग्रामीण राख के ढेर में दिन भर अपनी वस्तुएं तलाशते रहे। महिलाएं अपने मासूम बच्चों को गोद में उठाकर तबाही के मंजर को नम आंखों से देखती रहीं।
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आग रात को संतोष कुमार के घर से शुरू हुई। पूरा गांव गहरी नींद में था। संतोष ने बताया कि बाहर कुत्ता जोर-जोर से भौंकने लगा। पहले उन्होंने नजरअंदाज किया लेकिन कुत्ता चुप नहीं हुआ तो वह बाहर निकल आए। बाहर देखा कि साथ वाले कमरे से आग की लपटें निकल रही थीं। इसके बाद गांव में शोर मचाकर लोगों को नींद से जगाया गया।
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अग्निकांड के बाद तांगणु( बेनवाड़ी) गांव में 52 परिवार खुले आसमान के निचे रात गुजारने के लिए मजबूर है। जीवन की सारी पूंजी एक रात में खाक होने के गम में ढुबे ग्रामीण अब अपने नसीब को कोस रहे हैं। तांगणु( बेनवाड़ी) गांव में कभी रौनक हुआ करती थी। आज वहां राख के ढेरों के अलावा कुछ भी नजर नहीं आता है। सब कुछ खोने के बाद अब बेघर ग्रामीणों को सर्दियों की चिंता सता रही है।
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प्रशासन ने ग्रामीणों को रहने के लिए एक एक तिरपाल तो दे दिया है। लेकिन सर्दियों के ठंडे मौसम में तिरपाल के निचे रात गुजारना ग्रामीणों के लिए आसान नहीं होगा। करीब नौ हजार फीट की ऊंचाई वाले तांगणु (बेनवाड़ी) गांव में भारी बर्फबारी होती है। जिसकी चिंता भी अब ग्रामीणों को सता रही है।
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बर्फबारी में तिरपाल के निचे अपने छोटे छोटे बच्चों के साथ ग्रामीणों का रहना कठिनाई भरा होगा। अब ग्रामीणों की नजर सरकार व प्रशासन की ओर है। रोहल में ग्रामीणों के पास आय का मुख्य साधन खेती बाड़ी व पशुपालन है।
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तांगणु के बेनवाड़ी गांव में प्रभावित परिवारों के लिए भोजन का प्रबंध रविवार को प्रशासन की ओर से किया गया। तांगणु जांगलिख पंचायत के ग्रामीणों व प्रभावितों के रिश्तेदारों ने भोजन बनाकर सभी प्रभावित ग्रामीणों को खिलाया। बेनवाड़ी गांव के 52 परिवारों पर शनिवार देर रात कुदरत का कहर कुछ ऐसा टूटा कि उनका सब कुछ छीन कर ले गया। अब सभी परिवार दाने दाने के मोहताज हो गए हैं।
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रविवार को दोपहर का खाना तो प्रशासन ने दे दिया। लेकिन अब हर दिन दो वक्त की रोटी के लिए फिर से मेहनत करनी होगी। ग्रामीणों ने सर्दियों के लिए घरों में राशन सामग्री स्टोर कर रखी थी। स्वयं ग्रामीण गेंहू, मक्की, कोदा, ओगल सहित कई तरह का अनाज उगाते हैं, जिसे सर्दियों में खाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। दूरदराज के इस गांव में बर्फ अधिक गिरती है। इससे ग्रामीण राशन का भंडारण अधिक करते हैं। लेकिन अग्निकांड में स्टोर की हुई राशन सामग्री जलकर खाक हो गई।
अग्निकांड के बाद 52 परिवारों के 250 सदस्यों के पास तन के कपड़ों के अलावा कुछ नहीं बचा। घरों के अलावा उनका पैसा, गहने, कीमती सामान, राशन, सर्दियों के लिए स्टोर किया हुआ अनाज, पशुधन समेत सब कुछ राख हो गया है। गांव में अधिकांश लोग अनाज की पारंपरिक खेती और भेड़ पालन पर निर्भर थे।