पहाड़ी क्षेत्रों में देवी-देवताओं की आराधना की कई अजब-गजब परंपराएं हैं। दुर्गाष्टमी के व्रत और इस दिन मां के पूजन की भी यहां एक अनोखी ही परंपरा है। आज आठवां नवरात्र है। आज देवी के आठवें रूप महागौरी की पूजा होती है। ये परंपरा भी आज के ही दिन से जुड़ी है।
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दुर्गाष्टमी के व्रत और मां के पूजन की ये है सबसे अनोखी परंपरा
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हिमाचल के कई इलाकों में दुर्गाष्टमी के दिन लोग व्रत में गेहूं,
बाथू, सोयाबीन आदि की मुड़ी खाते हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में दुर्गाष्टमी का
व्रत अलग ही रीति से किया जाता है। इस दिन टीलों पर स्थापित देवी की
पारंपरिक विधि से पूजा होती है।
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पहाड़ी क्षेत्रों में बड़ों-बच्चों
में से अधिकांश लोग दुर्गाष्टमी का व्रत रखते हैं। दोपहर तक कुछ भी नहीं
खाते हैं। दोपहर बाद ऊंची पहाड़ी पर देवी के अलग-अलग टीलों पर एकत्रित होते
हैं। वहां परंपरागत तरीके से देवी की पूजा करते हैं।
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परंपरागत
कडासन मंत्रों और आग में घी डालकर उससे उत्पन्न धुएं के धूप से देवी की
पूजा करते हैं। हलुआ, मुड़ी, अखरोट आदि का देवी को प्रसाद चढ़ाया जाता है।
देवी का देवां (गूर) देवी के रूप में सभी को आशीर्वाद देता है।
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जैसे
ही पूजा संपन्न होती है, उसके बाद माता के प्रसाद के रूप में मुड़ी खाना
शुरू कर देते हैं। यह मुड़ी गेहूं, बाथू या सोयाबीन के दानों को भूनकर और
इसमें गुड़ मिलाकर तैयार की जाती है।
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पहले तो इसमें भांग के दाने भी
मिलाए जाते थे, मगर अब भांग के दाने उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। शिमला जिले
के ठियोग क्षेत्र की ग्राम पंचायत क्यार के गांव टिलकू (सांबर) के निवासी
संजय शास्त्री का कहना है कि इस क्षेत्र में पूरी परंपरा के साथ देवी की
उपासना की जाती है। व्रत के दिन दोपहर के समय ही मुड़ी खाना शुरू कर दिया
जाता है। इसे देवी के प्रसाद के रूप में खाया जाता है। यहां देवी की
पूजा-आराधना को सदियों से पारंपरिक रीति से ही किया जाता है।