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हिमाचल के कुल्लू का अयोध्या से 369 साल पुराना अटूट रिश्ता, ये है वजह

Mon, 11 Nov 2019 11:16 AM IST
Krishan Singh रोशन ठाकुर, अमर उजाला, कुल्लू
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भगवान रघुनाथ - फोटो : अमर उजाला
अयोध्या का देवभूमि कुल्लू से 369 साल पुराना अटूट रिश्ता रहा है। 1650 ई. में भगवान रघुनाथ को अयोध्या से देवभूमि कुल्लू लाया गया था। हालांकि, रघुनाथ को ढालपुर के रघुनाथ में 1660 ई. में विराजमान किया गया था। इससे पहले रघुनाथ को सबसे पहले मकराहड़ और बाद में धार्मिक स्थल मणिकर्ण में भी रखा गया। इसी के चलते मणिकर्ण को राम की नगरी भी कहा जाता है और यहां एक भव्य राम मंदिर भी बनाया गया है। 
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कुल्लू दशहरा
जिला कुल्लू में करीब 500 देवी-देवताओं के अधिष्ठाता भगवान रघुनाथ का अयोध्या से गहरा नाता रहा है। 1650 ई. में कुल्लू के राजा जगत सिंह के आदेश पर भगवान रघुनाथ, सीता और हनुमान की मूर्तियों को अयोध्या से दामोदर दास ने लाया था। उस समय कुल्लू रियासत के राजा जगत सिंह ने अपनी राजधानी को नग्गर से स्थानांतरित कर सुल्तानपुर में स्थापित किया था। तब एक दिन राजा को किसी दरबारी ने सूचना दी कि मड़ोली (टिप्परी) के ब्राह्मण दुर्गा दत्त के पास मोती हैं।
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भगवान रघुनाथ
राजा ने उससे मोती मांगे लेकिन उसके पास मोती नहीं थे। राजा के भय के कारण दुर्गा दत्त ने आत्मदाह कर लिया। इससे राजा को रोग लग गया। ब्रह्म हत्या के निवारण के लिए राजा जगत सिंह के राजगुरु तारानाथ ने राजा को सिद्धगुरु कृष्णदास पथहारी से मिलने को कहा। पथहारी बाबा ने उपाय सुझाया कि अगर अयोध्या से त्रेतानाथ मंदिर में अश्वमेध यज्ञ के समय की निर्मित राम-सीता की मूर्तियों को कुल्लू में प्रतिष्ठापित किया जाए, तो राजा रोग मुक्त हो सकता है। 

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कुल्लू दशहरा
पथहारी ने गुटका सिद्धि के ज्ञाता सुकेत में रह रहे अपने शिष्य दामोदर दास को अयोध्या में राम-सीता की मूर्तियों को लाने का काम सौंपा। दामोदर दास गुटका सिद्धि के प्रयोग से तत्काल अयोध्या पहुंचा। वहां पर त्रेतानाथ मंदिर में एक वर्ष तक पुजारियों की सेवा करते हुए पूजा विधि को समझता रहा। एक दिन राम-सीता की मूर्ति उठाकर तत्काल हरिद्वार पहुंचा। पीछे से अयोध्या का गुटका सिद्धि का ज्ञाता जोधावर भी हरिद्वार पहुंच गया। दामोदर दास ने कहा कि मैं इन मूर्तियों को राजा जगत सिंह को ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्ति दिलाने के लिए ले जा रहा हूं।
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कुल्लू दशहरा
भगवान रघुनाथ भी स्वयं कुल्लू आना चाहते हैं। अगर विश्वास नहीं है तो मूर्तियों को उठाकर ले जाओ। जोधावर मूर्तियां उठाने लगा लेकिन उससे अंगुष्ठ मात्र मूर्तियां भी उठाई नहीं गईं। जबकि दामोदर दास ने मूर्तियों को तुरंत उठा लिया। इसके बाद मूर्तियां मकराहड़ और मणिकर्ण होते हुए कुल्लू लाई गईं। मूर्ति लाने के बाद राजा ने रघुनाथ के चरण धोकर पानी पीया, जिससे राजा का रोग खत्म हो गया। 
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कुल्लू दशहरा
जिला देवी देवता कारदार संघ के पूर्व अध्यक्ष दोत राम ठाकुर कहते हैं कि इसके बाद राजा ने अपना सारा राजपाठ भगवान रघुनाथ को सौंप दिया। राजा स्वयं राजपाठ छोड़कर भगवान रघुनाथ के मुख्य छड़ीबरदार बन गए। इसी परंपरा का निर्वहन राज परिवार सदियों से कर रहा है। 
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महेश्वर सिंह मुख्य छड़ीबरदार भगवान रघुनाथ
भगवान रघुनाथ का अयोध्या से गहरा संबंध है और अभी अयोध्या में भगवान रघुनाथ का त्रेतानाथ और राम लला का मंदिर है। अयोध्या में भगवान राम का भव्य मंदिर बने, ऐसी देव समाज की इच्छा है। 
 - महेश्वर सिंह मुख्य छड़ीबरदार भगवान रघुनाथ
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