रेलवे का 113 साल पुराना स्टीम लोकोमोटिव इंजन ‘केसी 530’ बुधवार को एक बार फिर शिमला में ट्रैक पर उतरा। ब्रिटिश सैलानियों ने शिमला से कैथलीघाट तक 22 किलोमीटर लंबा सफर स्टीम इंजन से जोड़े गए वीआईपी कोच में तय किया। एक तरफ के लिए स्टीम इंजन को 1 लाख 20 हजार रुपये में बुक करवाया गया था। सुबह 9:20 बजे पर रेलवे यार्ड से निकल कर ऐतिहासिक स्टीम इंजन प्लेटफार्म तीखी सिटी और छुक-छुक की आवाज के साथ प्लेटफार्म पर पहुंचा। इसके बाद स्टीम इंजन में वीआईपी कोच जोड़े गए।
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ब्रिटिश सैलानियों के प्लेटफार्म पर पहुंचने के बाद 9:35 बजे स्टीम इंजन शिमला से कैथलीघाट की ओर रवाना हुआ। स्टीम इंजन चलाने की जिम्मेदारी लोको ड्राइवर राजेंद्र कुमार को सौंपी गई थी। उनके साथ बतौर सहायक जगपाल और नवरत्न सिंह भी स्टीम इंजन के साथ कैथलीघाट रवाना हुए। ड्राइवर राजेंद्र कुमार ने इंजन स्टार्ट किया जिसके बाद फर्स्ट फायर मैन ने कोयला डाल कर स्टीम तैयार की और सेकेंड फायरमैन ने केबिन तक कोयला पहुंचाया। स्टीम इंजन के रवाना होने से पहले सैलानियों ने शिमला रेलवे स्टेशन की खूबसूरती को अपने कैमरों में कैद किया।
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स्टीम इंजन में सफर करने वाली ब्रिटिश महिला डान स्टेनक्लिफ ने बताया कि ‘स्टीम इंजन के लिए मैं हमेशा से क्रेजी रही हूं। इसकी आवाज रोमांच पैदा करती है। स्टीम इंजन में सफर का मौका मैं कभी नहीं छोड़ सकती।’ स्टीम इंजन में कैथलीघाट तक सफर करने वाली मारिया कैवलिन ने कहा कि ‘मैं स्टीम इंजन से प्यार करती हूं, इसे देखना मुझे बहुत पसंद है। ब्रिटेन में भी स्टीम इंजन चलते हैं लेकिन शिमला की बात ही कुछ और है।’
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लंदन में टैक्सी चलाने का काम करने वाले ल्यू विल ने बताया कि ‘इंग्लैंड में टीवी प्रोग्राम पर स्टीम इंजन देखा था, इसके बाद से स्टीम इंजन के साथ सफर की ख्वाहिश थी, स्टीम इंजन के साथ सफर रेल सफर से अलग है।’
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इंग्लैंड में सेल्समैन का काम करने वाले एडी बैनर्स ने बताया कि ‘मुझे बचपन से ही स्टीम इंजन बेहद पसंद हैं। ट्रेन में घूमना मेरी हॉबी है। जब भी समय मिलता है शौकिया तौर पर स्टीम इंजन में घूमता हूं।’ स्टीम इंजन में भाप के पिस्टन में आगे पीछे चलने और बाहर निकलने से छुक-छुक की आवाज पैदा होती है। इतना ही नहीं स्टीम इंजन में बजने वाली तीखी सीटी भी भाप के दबाव से ही बजती है। इंजन में लाइट भी स्टीम से ही जलती है।
- स्टीम इंजन का इतिहास आंकड़ों की जुबानी
113 साल पुराना है केसी-520 स्टीम लोकोमोटिव इंजन
1905 में अंग्रेजों ने शिमला से कैथलीघाट के बीच चलाया
1971 के बाद 30 सालों तक वर्कशॉप में खड़ा रहा
2001 में दोबारा बना कर तैयार किया गया
41 टन है इंजन का वजन
80 टन तक खींचने की क्षमता