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Good Girl Sydrome: महिलाओं में होती है दूसरों की खुशी के लिए खुद को बदलने की क्षमता, कहीं ये बीमारी तो नहीं?

Wed, 22 Nov 2023 12:43 PM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Women - फोटो : istock
सोनम लववंशी

दूसरों की नजरों में अच्छा बनना और हमेशा बने रहना संभव नहीं है। अगर आप भी लगातार दूसरों की नजरों में अच्छा बनने का प्रयास करती हैं तो सतर्क हो जाएं, क्योंकि यह ‘गुड गर्ल सिंड्रोम’ का संकेत हो सकता है। क्या आप ऐसी लड़की हैं, जो सभी का ध्यान और प्यार पाने के लिए हमेशा अच्छी बनी रहना चाहती हैं। अच्छी से आशय है, ऐसी लड़की जिसे जमाना अच्छा समझे, जो सबकी बात सिर झुका कर माने, उनके अनुरूप कपड़े पहने और जैसा वे कहे, बिल्कुल वैसा ही करें। आज लोगों के मन में लड़कियों को लेकर अलग तरह की सोच है। वे मानते हैं कि लड़की सुंदर हो, समझदार हो और सर्वगुण संपन्न हो पर जैसी भी हो उनकी भावनाओं के अनुरूप हो। वे पारंपरिक रीति-रिवाज जानती हो व मानती भी हो और आकर्षक दिखने के साथ ही वह पारिवारिक भी हो।

आज की दुनिया में अच्छी लड़की होना आसान नहीं है, क्योंकि समाज का मानना है कि महत्वाकांक्षी बनो, लेकिन प्राथमिकता में केवल परिवार को रखो! ऐसी स्थिति में लड़कियां दूसरों की अपेक्षाओं पर खरा उतरने की कोशिश में कब अपने आप को बदल लेती हैं, उन्हें खुद भी पता नहीं चलता, जिसे 'गुड गर्ल सिंड्रोम' कहते हैं। यानी अच्छा बनने की कोशिश में अपनी नैसर्गिक क्षमताओं को भुला देना। ऐसे हालात न सिर्फ महिलाओं की पर्सनालिटी पर, बल्कि उनके फैसले लेने की क्षमता पर भी बुरा असर डालते हैं।
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क्या दूसरों के लिए अच्छा बनना बीमारी - फोटो : istock
बर्मिंघम की क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक डॉ. ललिता सुगलानी ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में 'अच्छी लड़की' को लेकर आठ अच्छाइयों का जिक्र किया और उन आदर्शों का भी खुलासा किया, जो समाज उनसे चाहता है। इन आदर्श गुणों में था,
  1. हमेशा खुश रहो
  2. दूसरों की अपेक्षा के मुताबिक संपूर्ण बनने की कोशिश करो
  3. ज्यादा से ज्यादा अच्छा बनने की कोशिश करो
  4. किसी बात को ठान लो तो उसे पूरा करो
  5. अपने आपको हमेशा शंका में रखो कि कहीं कोई गलती न हो,
  6. खुद को हमेशा दूसरों की सेवा के लिए तैयार करो
  7. अपने व्यवहार को सबके अनुरूप बनाओ
  8. आज्ञाकारी बेटी बनी रहो।
यह आठों आदर्श गुण समाज ने महिलाओं के लिए तय किए हैं। वह कहती है कि 'गुड गर्ल सिंड्रोम' सिर्फ लड़कियों तक सीमित हो ये जरुरी नहीं, ये लड़कों पर भी लागू होता है।
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क्या दूसरों के लिए अच्छा बनना बीमारी - फोटो : istock
डॉ. सुगलानी के मुताबिक, यह सिंड्रोम दर्शाता है कि कैसे लड़कियां दूसरों की खातिर सामाजिक रूप से प्रेरित होती हैं। बचपन से ही उन्हें सिखाया जाता है कि प्यार और सुरक्षा पाने के लिए हमें अपने आस-पास के लोगों को खुश रखना जरुरी है। फिर वह दूसरों की इच्छाओं को समझकर खुद को उस रूप में ढालती हैं और उनकी अपेक्षाओं को प्राथमिकता देती हैं।

इस प्रक्रिया ने एक तरह से हमारे व्यक्तित्व को दबा दिया, जो वास्तव में एक तरह से आत्म-परित्याग का ही रूप है। कई लड़कियां इस अवधारणा का बड़े होने तक ही पालन नहीं करतीं, बल्कि इसे जीवन का फार्मूला ही बना लेती हैं। आज भले ही लड़कियों को पहले की अपेक्षा ज्यादा फॉरवर्ड माना जाता हो पर ये संख्या बहुत ज्यादा नहीं है, जिसका सीधा सा मतलब है कि परिवार उनसे उतना ही बदलने की अपेक्षा करता है, जितना उनके लिए जरुरी हो।    

दूसरों को खुश करने के बाद भी लड़कियों की सराहना नहीं

आश्चर्य कि बात तो यह है कि इतना सब करने के बाद भी लड़कियों के काम की सराहना नहीं की जाती। आखिर उनका भी उतना ध्यान क्यों नहीं रखा जाता, जितना वे दूसरों का रखती हैं। लड़कियों को लेकर बताए गए ये आठ आदर्श या मापदंड अक्सर दूसरों को खुश रखने में ही खर्च हो जाते हैं। इस बीच, संभावित गलती के डर या दूसरों को निराश न करने की कोशिश से उनकी असल सोच भी प्रभावित होती है और अपने आपको उन आदर्शों पर खरा उतरने का प्रयास तनाव और चिंता को जन्म देता है और इससे आपकी रचनात्मकता सीमित होती जाती है और आप दूसरों की नजर में मूर्ख कहलाती हैं।
 

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गुड गर्ल सिंड्रोम का संकेत - फोटो : iStock
गुड गर्ल सिंड्रोम का संकेत

कभी किसी बात के लिए इंकार न करना भी लड़कियों के लिए अच्छा माना जाता। लड़कियां सबके सामने अच्छी छवि बनाए रखने के लिए ऐसा करती भी हैं। अगर आप भी दूसरों की भावनाओं को ठेस न पहुंचाने के लिए न नहीं कह पातीं, तो इसका संकेत है कि आपको 'गुड गर्ल सिंड्रोम' है।

यह सिंड्रोम लड़कियों को अक्सर मनोवैज्ञानिक रूप से टॉक्सिक, अपमानजनक और अनहेल्दी रिलेशनशिप के प्रति संवेदनशील बनाता है। परिवार की इच्छा की वजह से परफेक्ट दिखना लड़कियों की मजबूरी भी होती है और समाज की नकारात्मक प्रतिक्रिया से बचने के लिए इसे जरुरी भी समझा जाता है। जैसे-जैसे वे बड़ी होती जाती हैं, इसका नतीजा 'अनहेल्दी बिहेवियर' के रूप में सामने आने लगता है।

दूसरों को खुद से पहले रखना

किसी न किसी रूप में जो लड़कियां 'गुड गर्ल सिंड्रोम' से प्रभावित होती हैं, वे दूसरों की जरूरतों को अपनी इच्छाओं से ऊपर रखती है। लेकिन इस स्थिति में खुद की जगह बनाने के लिए उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ती है। यदि वास्तव में लड़कियां 'गुड गर्ल सिंड्रोम' से उभरना चाहती हैं तो इसके लिए जरुरी है कि वे 'लोग क्या कहेंगे' की सोच से ऊपर उठें, क्योंकि यही वे धारणा उन्हें दब्बू बना देती है।

इसके अलावा किसी पर भी भावनात्मक रूप से इतना निर्भर न रहें कि वह आपका शोषण करने लगे। समाज के हर रिश्ते के लिए एक लिमिट सेट करना सीखें। दूसरों से पहले अपने आपसे प्यार करें तभी दूसरे आपकी इज्जत करेंगे और आपसे प्यार करेंगे। इसके लिए जरूरी है कि अपने मन की सुने, दूसरों की नहीं। डॉ. सुगलानी कहती हैं, यह याद रखना जरूरी है कि हमारा मूल्य इस बात से निर्धारित नहीं होता है कि हम दूसरों को कितना खुश करते हैं, बल्कि यह स्वयं को प्रामाणिक रूप से व्यक्त करने की हमारी क्षमता से निर्धारित होता है।
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लड़कियों में जिम्मेदारी की भावना
अब हालात वैसे नहीं

प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. दिव्या गुप्ता कहती हैं, हमारे समाज की जो पुरातन सोच है वह निश्चित रूप से समय, काल और परिस्थिति की वजह से बनी होगी। इस तरह की सोच को संस्कारों की देन भी कहा जाता रहा है। लेकिन समय के साथ समाज को भी इसमें बदलाव लाना जरुरी हो गया, क्योंकि अब लड़कियों को न तो सामाजिक बंधनों की जरुरत है और न ही आज सामाजिक हालात उस तरह के हैं। अब लड़कियों में भी जिम्मेदारी की भावना बदल रही है और वे जागरूक हो रही हैं।

दरअसल, ये संक्रमणकाल है, जिसे समाज को भी महसूस करना होगा और लड़कियों को भी। दोनों तरफ से पहल जरुरी है। समाज और लड़कियों दोनों को दो-दो कदम आगे बढ़ाने होंगे तभी इस समस्या का हल निकलेगा और ये इतना भी मुश्किल नहीं है।
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