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Mahashivaratri: दुनिया के इस इकलौते मंदिर में होती है भगवान शिव के अंगूठे की पूजा, तीन बार रंग बदलता शिवलिंग

Tue, 25 Feb 2025 06:00 AM IST
अरविंद कुमार न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, सिरोही

सार

भारत देश में यूं तो भगवान शिव के हजारों मंदिर मौजूद हैं। लेकिन इन्हीं में से एक शिव मंदिर ऐसा भी है, जहां भगवान शिव के पैर के अंगूठे की पूजा होती है। जी हां राजस्थान के माउंट आबू में स्थित अचलेश्वर महादेव दुनिया का ऐसा इकलौत मंदिर है, जहां पर शिवजी के पैर के अंगूठे की पूजा होती है।
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अचलेश्वर महादेव मंदिर - फोटो : अमर उजाला

आज हम आपको सिरोही के एक अतिप्राचीन शिव मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जो विश्व में अपनी तरह का इकलौता मंदिर है। माउंट आबू के अचलगढ़ में अचलेश्वर महादेव विराजमान हैं। दावा किया जा रहा है कि ये अपनी तरह का इकलौता शिव मंदिर है, जहां पर भगवान शिव के शिवलिंग की नहीं, बल्कि उनके अंगूठे की पूजा की जाती है। इस मंदिर का इतिहास पांच हजार साल से भी ज्यादा पुराना है।

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अचलेश्वर महादेव मंदिर - फोटो : अमर उजाला

अर्बुदांचल की पहाड़ियों से घिरा हिल स्टेशन माउंटआबू न केवल एक पर्यटन स्थल है। बल्कि धार्मिक रूप से भी इसका अपना अलग महत्व है। यहां विभिन्न क्षेत्रों में कई अतिप्राचीन मंदिर है, जो अपना अलग इतिहास समेटे हुए है। आज हम माउंटआबू के अचलगढ़ स्थित अचलेश्वर महादेव मंदिर के बारे में बता रहे हैं।

वैसे तो देश में भगवान शिव के कई मंदिर हैं। इन मंदिरों में भगवान शिव की शिवलिंग के रूप में पूजा होती है। लेकिन यहां भगवान शिव के अंगूठे की पूजा होती है। इस मंदिर का इतिहास पांच हजार साल से भी पुराना है। इस मंदिर में कितना भी जल अर्पित करें कभी नहीं पता चला कि ये कहां जाता है। इसके साथ ही मंदिर के अंदर 108 छोटे शिवलिंग भी बने हुए हैं। आसपास कई प्राचीन प्रतिमाएं स्थापित हैं। गर्भगृह में अर्बुद नाग की प्रतिमा के बीच में गहरी खाई बनी हुई है। ये खाई कभी भरती नहीं है। गर्भ गृह में महाराजा कुम्भा द्वारा स्थापित कालभैरव समेत देव प्रतिमाएं स्थापित हैं।  

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शिवलिंग - फोटो : अमर उजाला

शिव के अंगूठे को लेकर यह है इतिहास
बताया जा रहा है कि प्राचीन काल में यहां पर काफी भूकंप आने लगे थे तो देवता ऋषि वशिष्ठ के पास पहुंचे थे तथा इस पर चिंता जताई थी। इसके बाद ऋषि वशिष्ठ ने समाधि ध्यान कर देखा कि महादेव के निवास नहीं करने से अर्बुद सांप हिल डूल रहा है। इससे यहां भूकंप आ रहे थे। इसके बाद यहां भगवान शिव के अंगूठे को स्थापित किया गया था। इसके साथ ही अर्बुद नाग को लाकर ब्रह्म खाई पर स्थापित किया गया। तब से अर्बुदांचल पर्वत यहां अचल हो गया। इसलिए इस मंदिर का नाम भी अचलेश्वर महादेव मंदिर के नाम से प्रचलित हो गया।

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अचलेश्वर महादेव मंदिर - फोटो : अमर उजाला

शिवपुराण एवं स्कंद पुराण में भी है मंदिर का उल्लेख
माउंटआबू ऋषि वशिष्ठ की तपस्थली है। इस मंदिर के बारे में शिवपुराण व स्कंद पुराण के अर्बुद खंड में भी उल्लेख किया हुआ है। मंदिर में कई प्राचीन प्रतिमाएं है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर दो हाथी की मूर्तियां बनी हुई है। अंदर मुख्य मंदिर के अलावा कई छोटे मंदिर बने हुए हैं। मुख्य मंदिर में एक शिलालेख लगा है जिसे प्राचीन भाषा में लिखा हुआ है। 

खाई में गाय के गिरने से अर्बुदांचल पर्वत को किया था स्थापित  
मंदिर के पुजारी ने बताया कि मंदिर हजारों वर्ष पुराना है। इंद्रदेव ने यहां एक ब्रह्म खाई बना दी थी। वशिष्ठ आश्रम में नंदिनी गाय रहती थी। जो खाई में गिर जाती थी। ऋषि ने देवी सरस्वती का आह्वान कर गाय को बाहर निकाला था। आज भी वशिष्ठ आश्रम में गाय के मुख से जलधारा बहती है। देवों ने ऋषि से कहा कि आपके आश्रम के बाहर गहरी खाई है, इसका कोई उपाय करों। तब यहां अर्बुदांचल पर्वत को यहां स्थापित किया गया।

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