बचाव कार्य में जुटी थी टीम
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28 दिसंबर: एनडीआरएफ के 6 जवानों की टीम बनाई गई। दो-दो जवानों को सुरंग खोदने के लिए 170 गहरे गड्ढे में उतारा गया। इन जवानों ने चार फीट सुरंग खोदी।
29 दिसंबर: सुरंग की खोदाई जारी रही, बीच में आ रहे पत्थरों को तोड़ने के लिए कंप्रेसर मशीन मंगवाई गई। मांइस एक्सपर्ट को बुलाकर पत्थर काटने की तकनीक समझी।
30 दिसंबर: प्रशासन और एनडीआरएफ के अधिकारियों ने दावा किया कि चेतना को आज (सोमवार को) बाहर निकाल लेंगे। लेकिन, पत्थरों और अन्य कारणों से इसमें फिर देरी हो गई। सुरंग खोद रहे जवानों को अंदर सांस लेने में भी परेशानी हुई।
31 दिसंबर: एनडीआरएफ के जवानों ने 10 फीट गहरी सुरंग की खोदाई पूरी की। लेकिन, सुरंग की खोदाई गलत दिशा में हो गई। जवानों को बोरवेल नहीं मिला। इसके बादा जीपीआर मशीन की मदद से बोरवेल की लोकेशन को ट्रेस कर फिर सुरंग खोदी गई।
एक जनवरी 2025: 10 दिन बाद चेतना को बाहर निकाला गया। लेकिन, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। चेतना की मौत हो चुकी थी।