अफीम की खेती
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आगामी दिनों में अफीम की लुगाई एवं चिराई का काम शुरू होगा लेकिन जब तक यह कार्य पूरा नहीं हो जाता किसानों के लिए कठिन परीक्षा की घड़ी निकलने वाली है। काले सोने के रूप में शुमार अफीम की फसल की सुरक्षा करना किसानों के लिए भारी पड़ रहा है। फसल को मौसम से बचाना काफी मुश्किल हो रहा है। पशु पक्षियों से बचाने में दिन रात लगे हुए हैं।
अफीम के डोडो को तोते तथा नीलगाय सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाते है। इससे बचने के लिए किसान अब जाल लगाने लगाने लगे हैं। इधर, जिले के खेतों में डोडे पकने की कगार पर है। 25 फरवरी के बाद मौसम अनुकूल रहा तो डोडे के चीरे लगाने का क्रम शुरू हो जाएगा।
इन दिनों फसल अपनी पूरी अवस्था में चल रही है। अब किसानों ने खेतों पर डेरा डाल दिया है। अफीम की फसल बढ़ने के साथ ही किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें भी बढ़ रही है। किसान परिवारों को फसल की सुरक्षा में दिन-रात खेतों में ही गुजारा करना पड़ रहा है। किसान अपनी फसल को प्राकृतिक प्रकोप, मवेशियों और पक्षियों से सुरक्षा करने तथा अफीम तस्करों से भी बचाने में जुटे हैं। भदेसर तहसील क्षेत्र के अफीम काश्तकार मुकेश धाकड़ ने बताया कि अफीम को काली देवी के रूप में पूजने की मान्यता है। इसे काला सोना भी कहा जाता है।