श्री शिला मातामंदिर
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4. श्री शिला माता मंदिर, आमेर
जयपुर के राजपरिवार के कछवाहा वंश की आराध्य देवी रहीं शिला माता आजादी के बाद जयपुरवासियों की प्रमुख शक्तिपीठ हैं। इस मंदिर की बहुत महिमा है और इसे चमत्कारिक भी कहा जाता है। यह तंत्र साधकों और उपासकों में भी प्रसिद्ध हैं। जयपुर की स्थापना से पहले आमेर रियासत थी, जहां के प्रतापी शासक राजा मानसिंह प्रथम ने शिला माता के आशीर्वाद से ही मुगल शासक अकबर के प्रधान सेनापति रहते हुए 80 से ज्यादा युद्ध में विजय हासिल की। आमेर महल परिसर में स्थित शिला माता मंदिर में आजादी से पहले तक सिर्फ राजपरिवार के सदस्य और प्रमुख सामंत-जागीरदार ही दर्शन कर पाते थे, अब रोजाना सैकड़ों भक्त माता के दर्शन करते हैं।
नवरात्र में तो माता के दर्शनों के लिए लम्बी कतारें लगती हैं और छठ के दिन मेला भरता है। जयपुर के प्राचीन प्रमुख मंदिरों में शुमार इस शक्तिपीठ की प्रतिस्थापना पन्द्रहवीं शताब्दी में तत्कालीन आमेर के शासक राजा मानसिंह प्रथम ने की। मंदिर का मुख्य द्वार चांदी का बना हुआ है। इस पर नवदुर्गा शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी एवं सिद्धिदात्री उत्कीर्ण है। दस महाविद्याओं के रूप में काली, तारा, षोडशी, भुनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर, भैंरवी, धूमावती, बगुलामुखी, मातंगी और कमला चित्रित है। दरवाजे के ऊपर लाल पत्थर की गणेशजी की मूर्ति प्रतिष्ठित है। द्वार के सामने चांदी का नगाड़ा रखा हुआ है। प्रवेश द्वार के पास दायीं ओर महालक्ष्मी और बायीं ओर महाकाली के चित्र उत्कीर्ण हैं।
शिला रूप में मिलने के कारण शिलादेवी कहलाईं
ऐसी धार्मिक मान्यता है कि शिला माता की प्रतिमा एक शिला के रुप में मिली थी। 1580 ईस्वी में इस शिला को आम्बेर के शासक राजा मानसिंह प्रथम बंगाल के जसोर राज्य पर जीत के बाद वहां से इसे लेकर आमेर आए थे। यहां प्रमुख शिल्प कलाकारों से महिषासुर मर्दन करते माता के रूप में उत्कीर्ण करवाया। इस बारे में जयपुर में एक कहावत भी बहुत प्रचलित में है-सांगानेर को सांगो बाबो, जैपुर को हनुमान, आमेर की शिला देवी लायो राजा मान।