अमृतसर के श्री हरमंदिर साहिब स्थित श्री गुरु रामदास लंगर विश्व की सबसे बड़ी सामुदायिक रसोई के तौर पर प्रसिद्ध है। इतनी बड़ी रसोई से रोजाना खाना बनाने के लिए पैसा दुनिया में बसे लाखों सिख परिवार भेजते हैं। वे अपनी कमाई का दसवां भाग गुरुद्वारों की सेवा में अर्पित करते हैं। इन्हीं पैसों से गुरुद्वारों की प्रबंध और लंगर का खर्च चलता है। सामान्य दिनों में रोजाना यहां एक लाख तक श्रद्धालु भोजन छकते थे। अब कोरोना काल में यह संख्या घटकर मात्र 25 हजार के करीब रह गई है। महामारी के दौरान बेशक दुनिया की सबसे बड़ी सामुदायिक रसोई में आटा, दाल, चीनी, दूध और देसी घी की खपत कम हुई है, लेकिन संगत की तरफ से इस रसोई के लिए दिए जाने वाले दान में किसी भी तरह की कमी नहीं आई है। श्री गुरु रामदास लंगर के इंचार्ज हरपिंदर सिंह ने बताया कि कोविड संकटकाल से पहले रोजाना एक लाख के करीब श्रद्धालु श्री हरिमंदिर साहिब पहुंचते थे। छुट्टियों वाले दिन और विशेष समागमों के दौरान यह संख्या डेढ़ से दोगुना तक हो जाती थी। कोविड के कारण बाहरी राज्यों और विदेशों से आने वाले श्रद्धालु यहां नहीं आ रहे हैं।
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लंगर
- फोटो : फाइल फोटो
हरपिंदर सिंह के मुताबिक, पहले लंगर में रोजाना औसतन 65 से 70 क्विंटल आटा और 15 से 60 क्विंटल के बीच दालों की खपत होती थी। अब यह कम होकर 45 क्विंटल और आठ क्विंटल रह गई है। इस लंगर में ऑटोमेटिक रोटी मेकर मशीन से एक घंटे में लगभग 25 हजार रोटी बनती है। इसके अलावा सौ गैस सिलेंडर, 500 किलो लकड़ी की खपत होती थी।
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लंगर
- फोटो : फाइल फोटो
पहले लंगर में रोजाना चार क्विंटल तक देसी घी खर्च होता था, जिसकी मात्रा अब कम होकर डेढ़ से दो क्विंटल रह गई है। लंगर में सब्जियों की खपत भी 19-20 क्विंटल से घट कर सात से आठ क्विंटल रह गई है।
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लंगर
- फोटो : फाइल फोटो
हरपिंदर सिंह ने बताया कि कोविड संकटकाल से पहले के दिनों में लंगर में चाय बनाने के लिए सात से आठ क्विंटल चीनी की खपत होती थी जो आज कम होकर करीब तीन क्विंटल और दूध की खपत 20 क्विंटल से कम होकर कर 10 क्विंटल रह गई है।
पिछले 24 साल से गुरु घर के लंगर की सेवा में लगे हरपिंदर सिंह ने बताया कि यह पहली बार है कि श्रद्धालुओं की संख्या इतनी कम हुई है। कोविड संकटकाल ने तो जिंदगी ही बदल दी है और यहां आने वालों की संख्या एक लाख से घटकर 25 हजार तक रह गई है।