यूपी में मैनपुरी के गांव कुड़रिया में बुधवार की रात अन्य रातों से बिल्कुल जुदा थी। लोगों की आंखों में न नींद थी और न दिल में शांति।
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18 साल बाद गांव आया शहीद बेटे का शव
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नींद आती भी तो कैसे 18 साल बाद गांव का चहेता शहीद गयाप्रसाद का शव जो आ रहा था।
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हालांकि आमतौर पर दिन छुपते ही सड़कों पर गुप अंधेरा और सन्नाटा हो जाता था। गांव में बिजली न होने के कारण अधिकांश लोग चारपाई पकड़ सोने चले जाते थे वहीं बुधवार रात को गांव में जेनरेटरों की धड़धड़ाहट गूंज रही थी।
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सभी को एक-एक पल वर्षों के समान लग रहा था।
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बुधवार रात 11.05 बजे सेना के जवान शहीद गयाप्रसाद का शव लेकर गांव पहुंचे।
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शहीद गया प्रसाद के बुजुर्ग पिता गजाधर सिंह घर के बाहर लोगों से घिर बैठे थे। उन्होंने बताया कि बेटे ने 1982 में फौज में नौकरी शुरू की थी और नवंबर 1996 में सियाचिन में पोस्टिंग हुई थी।
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घर में बैठे कुछ रिश्तेदार युवक फोन पर शहीद के बेटे सतीश से फोन पर शव
कहां तक पहुंचा आदि जानकारी लेकर पास बैठे लोगों को बता रहे थे।
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रात लगभग आठ बजे जैसे ही शव के फीरोजाबाद पार करने की सूचना ग्रामीणों को मिली। उनकी धड़कनें और बढ़ गईं।
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रात नौ बजे सीओ भोगांव और एसडीएम भोगांव गांव में पहुंचे और थोड़ी देर रुकने के बाद दूसरे दिन आने की बात कहकर गांव से चले आए। रात 11:05 बजे गांव में शहीद का शव पहुंच गया।
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शव देख परिवारीजनों की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली।
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1984 में पाकिस्तान सियाचिन ग्लेशियर में कुछ क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया था। पाकिस्तानी सेना को इस क्षेत्र से पीछे धकेलने के लिए वापस क्षेत्र पर भारतीय कब्जा करने के लिए आपरेशन मेघदूत चलाया था। इसी दौरान 1996 में गश्त पर निकले सैनिक गयाप्रसाद ग्लेशियर की दरार में समा गए थे।
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तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष जनरल वेद मलिक ने 16 नवंबर 1999 को शहीद घोषित किया और शहीद पत्र व सभी सुविधाएं सैनिक के परिवार को देने की घोषणा की थी।
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लगभग एक सप्ताह पहले सियाचिन में सेना के जवानों की एक टुकड़ी रुटीन गश्त पर थी। इस दौरान ग्लेशियर पर बर्फ के बाहर एक हाथ निकला दिखाई दिया। सेना के जवानों ने शव को बाहर निकाला तो उसकी पहचान गयाप्रसाद के रूप में हुई।
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18 साल पहले मिला जख्म वक्त के साथ धीरे धीरे भर गया था। गया प्रसाद की पत्नी रामादेवी ने उनकी जिम्मेदारी को परिवारीजनों के सहयोग निभाया और बेटे बेटियों की शादी की। अब जो हुआ उसकी तो किसी को भी उम्मीद नहीं थी।
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एसी एंबुलेंस से दिल्ली से शव को लेकर गांव आ रहे डाक्टर आदेश कुमार ने बताया कि चेहरे की त्वचा थोड़ी खराब हो गई है लेकिन पूरा शरीर सही सलामत है। बर्फ में दबा गयाप्रसाद का शव 18 साल बाद भी सुरक्षित रहा।
90 वर्षीय पिता गजाधर सिंह और रामादेवी को हमेशा यही मलाल रहता था कि अंतिम दर्शन तक वह नहीं कर पाए। गजाधर और अन्य परिवारीजनों का कहना है कि अब शास्त्रों के अनुसार अंत्येष्टि और अन्य क्र्तियाएं पूरी हो जाएगी। मान्यता है, इनके बिना आत्मा को मुक्ति नहीं मिलती।