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अंतर्जातीय विवाह के बहुत फायदे, शादी करने से पहले पढ़े ये खबर

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भले ही अंतर्जातीय विवाह का विरोध होता हो लेकिन विज्ञान अंतर्जातीय विवाह के पक्ष में है। इसे प्रोत्साहन मिलना चाहिए। अगर एक ही जातियों में विवाह की परंपरा रही तो प्रजातियां खत्म होने लगेंगी। एक ही जाति में विवाह होने के कारण कई प्रजातियां विलुप्त होने के कगार पर हैं और वे अनजानी बीमारी से मर रहे हैं। यह कहना है भारत में जीनोम फिंगर प्रिंटिंग के जनक माने जाने वाले पद्मश्री वैज्ञानिक प्रोफेसर लालजी सिंह का।
ब्यूरो/अमर उजाला, शाहजहांपुर।
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अंतर्जातीय विवाह के बहुत फायदे, शादी करने से पहले पढ़े ये खबर

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शुक्रवार को यहां एसएस कॉलेज में विज्ञान संकाय की ओर से आयोजित इंटरनेशनल कांफ्रेंस में शामिल होने आए प्रोफेसर सिंह ने जीनोम कोड पर बात की। उन्होंने कहा कि भारत में आर्य और द्रविड़ जैसी बातें निराधार हैं। नवीन अनुसंधानों से पता चला है कि करीब 85 हजार साल पहले इंसान अफ्रीका से भारत की तरफ आए थे।

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अंडमान निकोबार द्वीप की आदिवासी जनजातियां पूरी दुनिया से अलग-थलग रहकर एक सीमित क्षेत्र में रहीं। उनमें वैवाहिक संबंध भी आपस में ही बनें। इससे आनुवंशिक गड़बड़ियां हुईं और वे लगातार अनजानी बीमारियों से मर रहे हैं। प्रो. सिंह ने कहा कि इसी कारण भारत में प्रारंभ से ही समगोत्र विवाह का विरोध किया गया।

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उन्होंने कहा कि विज्ञान की भाषा में समजातीय विवाह को इंडोमेवी कहते हैं। इससे कई बीमारियों को जन्म हो रहा है। नजदीकी रिश्ते में विवाह करने से जीन में पुरानी बीमारियां वंशजों में बढ़ती जाती हैं। उन्होंने कहा कि कुछ जातियों में कुछ विशेष बीमारियां दिखाई देती हैं। जैसे एक जाति के लोगों को आम लोगों के बराबर बेहोश करने वाली दवा नहीं दी जाती क्योंकि उनमें इसे सहने की क्षमता तुलनात्मक रूप से कम होती है। भविष्य में प्रोसीजन मेडिसिन जीन देखकर दवाएं तय की जाएंगी।
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उन्होंने यह भी बताया कि स्टेमसेल के क्षेत्र में भी कई खोजें हो रही हैं और यह ब्लड कैंसर जैसी बीमारियों में बहुत प्रभावी हैं। हालांकि गर्भनाल सुरक्षित रखने के लिए स्टेमसेल बैंक खुलना महज धंधा है। अभी तक कोई ऐसी तकनीक ईजाद नहीं हुई है जो बीमारियों में इसके प्रयोग को उपयोगी बनाती हो।

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जेनेटिक अध्ययन के लिए भारत सोने की खान-स्वामी शुकदेवानंद स्नातकोत्तर महाविद्यालय (एसएस कॉलेज) में विज्ञान संकाय की ओर से इंटरनेशनल कांफ्रेंस में जैव रसायन और पर्यावरण में नवाचार विषय पर देश विदेश के वैज्ञानिकों ने अपने विचार रखते हुए भारत की महत्ता की बताई। वैज्ञानिकों ने भारत को सर्वाधिक जैव विविधता वाला देश बताते हुए जेनेटिक विज्ञानियों के लिए सोने की खान बताया।
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मुख्य अतिथि सीसीएमबी हैदराबाद के पूर्व निदेशक, बीएचयू  के पूर्व कुलपति एवं भारत में जीनोम फिंगर प्रिंटिंग के जनक माने जाने वाले पद्मश्री प्रोफेसर लालजी सिंह ने देश-दुनिया के अध्ययन पर अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि भारत सर्वाधिक जैविकीय विविधता के चलते सारी दुनिया के मानव विज्ञानियों के लिए अध्ययन का विषय बना हुआ है। यहां के लोगों में भाषा, संस्कार, सामाजिक संरचना, पहनावे आदि में अंतर दिखाई देता है। यह अंतर भारत की आनुवंशिक विविधता को बचाए हुए है।

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देश में साढ़े चार हजार से अधिक आनुवंशिक जीनोम कोड पाए जाते हैं। इतना ही नहीं, यहां पांच सौ से अधिक जनजातियां हैं, जो अपनी भाषा, पहनावे, संस्कार और संस्कृति के कारण भिन्न हैं। विशिष्ट अतिथि टर्की के डॉ. अहमद अनवर ने खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में अल्ट्रासाउंड द्वारा हुए क्रांतिकारी बदलाव की जानकारी दी। कहा: खाद्य क्षेत्र में अल्ट्रासाउंड तकनीक का इस्तेमाल उत्पादकता बढ़ाने के साथ उत्पादित वस्तुओं को सुरक्षित रखने और उन्हें लोगों तक पहुंचाने में सहायता मिल सकती है। इस तकनीक से सुदूर क्षेत्रों में फल, सब्जियों आदि को सुरक्षित पहुंचाया जा सकता है।
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समापन सत्र में मुख्य अतिथि विल्सन कॉलेज मुंबई के प्रो. डीवी प्रभु, विशिष्ट अतिथि डॉ. ज्योत्सना चतुर्वेदी, डॉ. प्रियव्रत द्विवेदी आदि ने अपने अनुभव बांटे। इस अवसर पर शिक्षकों में डॉ. कहकशां बेगम, केशव शुक्ला, डॉ. अनिल सिंह आदि और शोधार्थी वर्ग में विवेक सक्सेना, गिरधारी चौरसिया, महेश गुप्ता के प्रस्तुत किए शोधपत्र पुरस्कृत किए गए। पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री स्वामी चिन्मयानंद की अध्यक्षता में हुई कांफ्रेंस में अतिथियों का स्वागत प्राचार्य डॉ. एके मिश्रा ने और आभार संयोजक डॉ. आलोक सिंह ने व्यक्त किया।
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