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अगर बाबर न आता तो भारत कैसा होता?

Sun, 14 Feb 2016 06:04 PM IST
ज़ुबैर अहमद/ बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
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वैलेंटाइन डे प्रेम का प्रतीक माना जाता है। आज के दिन अर्थशास्त्री माल्थस पैदा हुए थे। बॉलीवुड की स्टार मधुबाला भी आज ही के दिन बर्थडे का जश्न मनाती थीं। लेकिन आज ही के दिन एक और ऐतिहासिक व्यक्ति और शायद विवादास्पद भी, का जन्म हुआ था। विवादास्पद इसलिए कि भारत में कुछ लोग उन्हें आक्रमणकारी कहते हैं और अयोध्या में बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाता है। लेकिन उनकी शख्यियत विभिन्न रंगों से भरी थी। वे कोई और नहीं भारत में मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर थे।


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अगर बाबर न आता तो भारत कैसा होता?

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इतिहासकार हरबंस मुखिया कहते हैं, ''बाबर का व्यक्तित्व संस्कृति, साहसिक उतार-चढ़ाव और सैन्य प्रतिभा जैसी खूबियों से भरा हुआ था।'' बाबर भारत न आता तो भारतीय संस्कृति के इंद्रधनुष के रंग फीके रहते। (ज़ुबैर अहमद/ बीबीसी संवाददाता, दिल्ली) हरबंस मुखिया कहते हैं कि यह आम गलतफहमी है कि अयोध्या की विवादास्पद बाबरी मस्जिद बाबर ने बनवाई थी। उनके मुताबिक, बाबरी मस्जिद का जिक्र उसके जिंदा रहने तक या उसके मरने के कई सौ साल तक नहीं मिलता। बाबर ने 1526 में पानीपत की लड़ाई में जीत की खुशी में पानीपत में ही एक मस्जिद बनवाई थी, जो आज भी वहीं खड़ी है।

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बाबर 12 वर्ष की उम्र में राजा बने, लेकिन 47 साल की उम्र में मरते दम तक वे युद्ध में जुटे रहे। इसके बावजूद बाबर ने पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाईं। उनकी जिन्दगी पर माँ और नानी का गहरा असर था जिन्हें वे बेइंतहा प्यार करते थे। वे अपनी बड़ी बहन के लिए एक आदर्श भाई थे।

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मुगल बादशाह हुमांयूं बाबर के सबसे बड़े बेटे थे। उनके लिए बाबर एक समर्पित पिता थे। हुमांयूं एक बार बहुत बीमार पड़ गए। बाबर ने बीमार हुमांयू के जिस्म के तीन गर्दिश किए और ख़ुदा से दुआ मांगी कि उनके बेटे को स्वस्थ कर दे और उसकी जगह पर उनकी जान ले ले। हुमांयू तो ठीक हो गए। लेकिन कुछ महीनों में बाबर बीमार हुए और उनकी मौत हो गई।
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भारत में भले बाबर को वो सम्मान नहीं मिला, जो उनके पोते अकबर को मिला था, लेकिन उज्बेकिस्तान में बाबर को वही दर्जा हासिल है जो भारत में अकबर को। उनकी किताब के कई शब्द भारत में आम तौर से प्रचलित हैं। 'मैदान' शब्द का भारत में पहली बार इस्तेमाल बाबरनामा में देखने को मिला। प्रोफेसर हरबंस मुखिया कहते हैं कि आज भी भारत में बोली जाने वाली भाषाओँ में तुर्की और फारसी शदों का प्रयोग आम है। उन्होंने 1930-40 में राज करने वाले एक मराठी हाकिम का उदाहरण देते हुए कहा कि उसने अपनी भाषा में उर्दू और फारसी शब्दों से पाक करने के लिए एक फरमान जारी किया। उनके एक सलाहकार ने कहा कि हुज़ूर 'फरमान' समेत आपके फरमान में इस्तेमाल किए गए 40 प्रतिशद शब्द फारसी और उर्दू के हैं।
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बाबर दुनिया के पहले शासक थे, जिन्होंने अपनी आत्मकथा लिखी। बाबरनामा उनके जीवन की नाकामियों और कामयाबियों से भरी पड़ी है। हरबंस मुखिया के अनुसार बाबर की सोच थी कि कभी हार मत मानो। उन्हें समरकंद (उज्बेकिस्तान) हासिल करने का जुनून सवार था। उन्होंने समरकंद पर तीन बार कब्जा किया, लेकिन तीनों बार उन्हें शहर से हाथ धोना पड़ा। अगर वे समरकंद का राजा बने रहते तो शायद काबुल और भारत पर राज करने की कभी नहीं सोचते।

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प्रोफेसर मुखिया के अनुसार तुर्क भाषा में कविता लिखने वाली दो बड़ी हस्तियां गुजरीं, उनमें से एक बाबर थे।
बाबर की कठोरता की मिसालें मिलती हैं, लेकिन उनकी मृदुलता के भी कई उदाहरण हैं। एक बार वे जंग की तैयारी में लगे थे कि किसी ने उन्हें खरबूजे पेश किया। बाबर ख़ुशी के मारे रो पड़े। सालों से उन्होंने खरबूजे की शकल नहीं देखी थी।

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