वास्तुशास्त्र के अनुसार, ध्यान का क्षेत्र उत्तर-पूर्व दिशा (ईश्ान कोण) को माना गया है। यह दिशा मानसिक स्पष्टता और प्रज्ञा यानी इंट्यूशन से जुड़ी है। इसलिए नवरात्र काल में माता की प्रतिमा या कलश की स्थापना इसी दिशा में की जानी चाहिए।
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नवरात्र के नौ दिन, इन नौ बातों से पाएं धन और सुख
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माता की पूजा के दौरान पूजा करने वाले का मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रहना चाहिए, क्योंकि पूर्व दिशा शक्ति और शौर्य का प्रतीक है। पूर्व दिशा की ओर मुख करके माता का ध्यान करने से हमारी प्रज्ञा जागृत होती है।
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माता की मूर्ति को लकड़ी के पाटे पर ही रखें। अगर चन्दन की चौकी हो, तो और भी अच्छा रहेगा। वास्तुशास्त्र में चंदन शुभ और सकारात्मक उर्जा का केंद्र माना गया है। इससे वास्तुदोषों का शमन होता है।
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अखंड ज्योति को पूजन स्थल के आग्नेय कोण में रखा जाना चाहिए। इस दिशा में अखंड ज्योति रखने से घर के अंदर सुख-समृद्धि का वास होता है और शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है।
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शाम के समय पूजन स्थान पर इष्ट देव के सामने प्रकाश का उचित प्रबंध होना चाहिए। इसके लिए घी का दीया जलाना अत्यंत शुभ माना गया है।
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पूजा संबंधी सामान को पूजा कक्ष के दक्षिण-पूर्व दिशा में रखें। इस कमरे की दीवारों पर हल्का पीला या हरा, गुलाबी रंग करवाना अच्छा रहता है। इससे सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार होता है।
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नवरात्र में वातावरण को शुद्ध और पवित्र करने के लिए घर में गुग्गुल, लोबान, कपूर, देशी घी आदि के धुएं का प्रयोग करें। इससे घर में शुद्धता बनी रहती है।
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पूजा घर में स्वास्तिक भी रख सकते हैं अथ्ावा रोली या कुमकुम से पूजन स्थल के दरवाजे के दोनों ओर स्वास्तिक बना सकते हैं। इससे मां की विशेष कृपा प्राप्त होती है और वास्तुदोषों का नकारात्मक प्रभाव भी दूर होता है। वैसे भी ओम और स्वास्तिक जैसे शुभ्ा प्रतीक हमारे जीवन में सकारात्मकता लेकर ही आते हैं। उत्तर-पूर्व दिशा में स्वास्तिक का चिह्न लगाने से आप स्वयं के साथ गहरा जुड़ाव अनुभव करेंगे और अपने हर काम में सफल होंगे।