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विश्व धरोहर दिवस: पौराणिक और सांस्कृतिक विरासतों का केंद्र 'देश का दिल' मध्य प्रदेश 

Mon, 18 Apr 2022 03:20 PM IST
अंकिता विश्वकर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भोपाल

सार

विश्व धरोहर दिवस: पौराणिक और सांस्कृतिक विरासतों का केंद्र 'देश का दिल' मध्य प्रदेश
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मध्य प्रदेश की ऐतिहासिक विरासतें - फोटो : सोशल मीडिया
हर साल दुनियाभर में 18 अप्रैल को विश्व धरोहर दिवस मनाया जाता है। भारतभर में कई ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के स्थल हैं। आइए आज वर्ल्ड हेरिटेज डे के अवसर पर हम आपको देश के दिल मध्य प्रदेश की अमूल्य धरोहरों से रूबरू कराते हैं। 

पौराणिक और सांस्कृतिक विरासतों की नगरी एमपी 
मध्य प्रदेश अपनी पौराणिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है। यहां बौद्ध स्तूप से लेकर इतिहास के गवाह किले आज भी मौजूद हैं, यही वजह है कि हर साल बड़ी संख्या में देशभर से सैलानी मध्य प्रदेश में ऐतिहासिक विरासतों के दीदार के लिए पहुंचते हैं। मध्य प्रदेश ऐतिहासिक धरोहरों के साथ ही कला और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी एक मुख्य केंद्र है, यहाँ एक से बढ़ कर एक पर्यटन स्थल मौजूद हैं। 

मध्य प्रदेश में भगवान राम के वनवास से जुड़ी पौराणिक गाथाएं हैं तो पांडव कालीन गुफाएं भी। सीना ताने खड़े पुराने किले आज भी इतिहास के किस्सों और कहानियों को अपने अंतस में सेमेटे बैठे हैं और आने वालों को गुजरे वक्त की दास्तां सुना रहे हैं। देश के दिल में बसे मध्य प्रदेश के तीन स्मारक और दो शहर यानि खजुराहो स्मारक, सांची के बौद्ध स्मारक, भीमबेटका रॉक आश्रय, ग्वालियर और ओरछा यूनेस्को की सूची में शामिल हैं। 
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मध्य प्रदेश में मौजूद ऐतिहासिक स्थल - फोटो : अमर उजाला
खजुराहो स्मारक 
'खजुराहो स्मारक' की नागर-शैली की वास्तुकला, नायकों और देवताओं की सुंदर मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध है। खजुराहो में स्थापित जटिल मूर्तियों की भव्यता पर्यटकों को बार-बार यहां आने के लिए आकर्षित करती है। यहां दो धर्म के मंदिर स्थापित हैं - हिन्दू और जैन धर्म। यह साइट मध्यकालीन शताब्दी में चंदेल राजवंश द्वारा निर्मित की गई थी। यहां के मंदिर अपनी शिल्प कौशल के लिए प्रसिद्ध हैं, जिसमें बेहतरीन मूर्तियों और असाधारण स्थापत्य कौशल के शानदार प्रदर्शन शामिल हैं, जो उन्हें भारत में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों में से एक बनाती हैं। इन मंदिरों को तीन समूहों में बांटा गया है: पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी। सुंदर, विस्तृत और अभिव्यंजक, खजुराहो मंदिरों की मूर्तियां आपको विस्मय में छोड़ देंगी। हर साल फरवरी महीने में राज्य सरकार के द्वारा खजुराहो डांस फेस्टिवल का आयोजन कराया जाता है। यह सांस्कृतिक आयोजन कला और स्थापत्य का अद्भुत मिश्रण है। भारत के विभिन्न शहरों और कस्बों से यहां आने वाले प्रसिद्ध कलाकारों द्वारा मंत्रमुग्ध कर देने वाले शास्त्रीय नृत्य प्रदर्शनों की एक अद्भुत सिम्फनी का अनुभव होता है।
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खजुराहो - फोटो : अमर उजाला
सांची के बौद्ध स्मारक
मध्य प्रदेश के विदिशा में  स्थित सांची के ऐतिहासिक स्तूप अपनी मंत्रमुग्ध कर देने वाली सरंचना के लिए जाने जाते हैं। यह देश के सबसे पुराने बौद्ध स्मारकों में से एक हैं। सांची स्तूप मूल रूप से तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मौर्य सम्राट अशोक द्वारा बनाया गया था। माना जाता है कि इसमें बुद्ध की राख थी। विशाल स्तूप, जिसमें स्वयं बुद्ध के अवशेष हैं। ऐतिहासिक कहानियों को बताने वाली जटिल नक्काशीदार पत्थर की कलाकृतियां, सांची के महान स्तूप को प्राचीन दुनिया के चमत्कारों में से एक बनाने में मदद करती हैं।

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सांची के स्तूप - फोटो : सोशल मीडिया
भीमबेटका रॉक आश्रय 
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग 45 किलोमीटर दूर भीमबेटका रॉक आश्रय स्थित है। यह मध्य भारत में एक पुरातात्विक स्थल है जो पुरापाषाण और मध्यपाषाण काल से लेकर ऐतिहासिक काल तक फैला है। यह यूनेस्को का विश्व धरोहर स्थल है जिसमें सात पहाड़ियां और 750 से अधिक रॉक शेल्टर शामिल हैं जो 10 किमी में फैले हुए हैं। इन 750 रॉक शेल्टर में से 500 शेल्टर पेंटिंग से सजे हुए हैं। हजारों साल पुरानी आर्ट गैलरी भीमबेटका के विशाल, काले शिलाखंडों के बीच छिपी है। 
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भीम बेटिका - फोटो : अमर उजाला
ग्वालियर
मध्य प्रदेश का ग्वालियर जिला  घूमने के लिए देश-विदेश से बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। 9वीं शताब्दी के  स्थापित इस शहर में गुर्जर प्रतिहार राजवंश, तोमर, बघेल कछवाहों और सिंधिया राजघराने ने शासन किया था। यह शहर ऐतिहासिक ग्वालियर किले, सिंधिया रॉयल पैलेस, जय विलास पैलेस और पर्यटकों की रुचि के अन्य स्मारकों की मेजबानी करता है। यह एक बलुआ पत्थर के पठार पर स्थित है और इसमें स्मारक, किले और महल शामिल हैं। प्रसिद्ध स्थानों में सूर्य मंदिर, जय विलास पैलेस, तानसेन का मकबरा, तिगरा बांध, 15 वीं शताब्दी का गूजरी महल पैलेस शामिल हैं।
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ग्वालियर का किला - फोटो : अमर उजाला
ओरछा 
बेतवा नदी के तट पर बसे ऐतिहासिक शहर ओरछा की स्थापना 16 वीं शताब्दी में बुंदेला राजपूत प्रमुख रुद्र प्रताप ने की थी। इस शहर की कई स्मारकों ने आज भी अपनी मूल भव्यता को बरकरार रखा है।
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ओरछा की छतरियां - फोटो : अमर उजाला
यहां राम राजा मंदिर एकमात्र ऐसा स्थान है जहां भगवान राम को भगवान और राजा दोनों के रूप में पूजा जाता है। लक्ष्मी नारायण मंदिर एक अनूठी स्थापत्य शैली को प्रदर्शित करता है, जो एक किले और एक मंदिर का मिश्रण है। ओरछा की छतरियां प्रसिद्ध स्मारक हैं। 
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