सीहोर के कुबेरेश्वर धाम में उमड़ा जनसैलाब
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विशिष्ट अतिथियों का गरिमामयी सान्निध्य
कथा के दूसरे दिन मंच पर देश की अनेक प्रतिष्ठित विभूतियों की उपस्थिति ने कार्यक्रम को और भी गरिमामय बना दिया। डॉ. उमाशंकर पाण्डेय, जिन्हें जल संरक्षण के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया जा चुका है, ने महाराज श्री के कार्यों की तुलना राष्ट्र-ऋषि नानाजी देशमुख से की। उन्होंने भावुक स्वर में कहा कि जिस प्रकार नानाजी देशमुख ने ग्रामीण विकास और समाज निर्माण के लिए जीवन समर्पित किया, उसी प्रकार पंडित प्रदीप मिश्रा जी करोड़ों लोगों को प्रकृति संरक्षण और जल बचाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि ऐसे संत को ‘पद्म पुरस्कार’ से सम्मानित किया जाना चाहिए।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पर्यावरण गतिविधि के राष्ट्रीय संयोजक गोपाल आर्या ने प्रकृति रक्षा को धर्म रक्षा बताया। उन्होंने उदाहरणों और प्रेरक कथाओं के माध्यम से समझाया कि यदि हम वृक्षों और जल स्रोतों की रक्षा करेंगे, तभी सच्चे अर्थों में धर्म का पालन होगा। पतंजलि ग्रामोद्योग न्यास के महामंत्री डॉ. यशदेव शास्त्री ने कहा कि महाराज श्री की लोकप्रियता ने स्वदेशी और योग के प्रसार को नई दिशा दी है। पतंजलि परिवार की ओर से उन्होंने उनका अभिनंदन किया।
‘शिव तो श्वांसों में हैं’: आत्मलिंग का दिव्य ज्ञान
कथा के मुख्य आध्यात्मिक बिंदु ने उपस्थित जनसमूह को भीतर तक झकझोर दिया। पंडित प्रदीप मिश्रा ने कहा कि आत्मा को ही लिंग कहते हैं, जिसे ‘आत्मलिंग’ कहा गया है। महादेव हमारी श्वांसों के रूप में हमारे भीतर ही विराजमान हैं। उन्होंने समझाया कि शिव को बाहर ढूंढने की आवश्यकता नहीं है। जब मन शांत होता है और श्वांसों में स्थिरता आती है, तब वही आत्मलिंग का अनुभव होता है। यह संदेश केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है। स्वयं को पहचानने की साधना।