मां दुर्गा के पंडाल की तस्वीरें।
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कायम है परंपरा
जितना मनमोहक माता का पंडाल बनाया जाता है, उतनी ही भव्य मां की सवारी दशहरे के दिन निकलती है। जब 1905 में दुर्गोत्सव की शुरुआत हुई थी, तब लाइट की व्यवस्था नहीं थी। तब मां की सवारी के आगे मशाल चलती थी। आज भी, आगे मशाल और पीछे भक्तों के कंधों पर मां की पालकी होती है।चल माई, चल माई" के उद्घोष के साथ पूरा क्षेत्र गूंज उठता है। सड़क के दोनों ओर मां के दर्शन के लिए श्रद्धालु उमड़ पड़ते हैं।