ऐरण सागर जिले की बीना तहसील का एक ऐसा पुरातात्विक स्थल है, जो हजारों साल से चली आ रही हिंदू धर्म की परंपराओं, कला एवं संस्कृति के संरक्षक के रूप में आज भी विद्यमान है।
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ऐरण
- फोटो : अमर उजाला
खास बात ये है कि यहां पर गुप्तकाल में भगवान विष्णु के दस अवतारों की मूर्तियां देखने को मिल जाएंगी। एरण में गुप्तकालीन कला के प्रतीक के तौर पर कृष्ण लीला का सुंदर और मनोहरी वर्णन किया गया है। लाल बलुआ पत्थर पर कृष्ण जन्म से लेकर कंस वध तक की प्रतिमाएं बनाई गई हैं।
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कृष्णलीला शिलालेख
- फोटो : अमर उजाला
जानकार बताते हैं कि भारत में किसी भी पुरातात्विक महत्व के स्थान पर कृष्ण लीला के प्रमाण नहीं मिले हैं। पुरातत्वविदों का कहना है कि यह शिलापट्ट 1600 से 1800 साल पूर्व के हैं। ऐरण अकेला ऐसा स्थान है, जहां पर गुप्तकाल के कृष्णलीला के प्रमाण हैं।
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श्रीकृष्ण प्रतिमाएं
- फोटो : अमर उजाला
डॉ. हरी सिंह गौर विश्वविद्यालय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. नागेश दुबे बताते हैं कि ऐरण बुंदेलखंड का सबसे प्राचीनतम स्थल साबित हुआ है। ऐरण में ब्रिटिशकाल से लेकर अब तक पुरातत्व विभाग ने कई बार उत्खनन और सर्वेक्षण किए गए हैं।
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कृष्ण प्रतिमाएं
- फोटो : अमर उजाला
इसका इतिहास नवपाषाण युग से प्रारंभ होता है। सबसे ज्यादा महत्व ऐरण को गुप्तकाल में मिला है। गुप्तकाल की ये क्षेत्रीय राजधानी थी और कहा गया है कि चंद्रगुप्त के बेटे रामगुप्त का शासन यहीं था। उसके बाद चंद्रगुप्त द्वितीय ने यहां का शासन संभाला।
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कृष्णलीला शिलालेख
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महान सम्राट समुद्र गुप्त के समय में इसे स्वभोग नगर कहा गया। इसके कई कथानक मिलते हैं। गुप्तकाल के शासकों के सिक्के और अभिलेख यहां पर मिले हैं। उनके द्वारा बनाए गए विष्णु मंदिर हैं, जिसमें महाबराह, विष्णु, बलराम की प्रतिमा स्थापित है। वैष्णव धर्म के अनेक साक्ष्य वहां स्थापित हैं और यहां की अनेक प्रतिमाएं सागर यूनिवर्सिटी के संग्रहालय में भी संरक्षित की गई हैं।
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श्रीकृष्ण प्रतिमाएं
- फोटो : अमर उजाला
गुप्तशासक वैष्णव धर्म को मानने वाले थे। विष्णु के विभिन्न अवतारों, वैष्णव धर्म से संबंधित देवी-देवताओं की प्रतिमा यहां स्थापित है। इसी तरह कृष्ण लीला के दृश्य भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने सुरक्षित रखने के उद्देश्य से करीब 50 साल पहले ऐरण में स्थित एक चबूतरे में जड़ दिए गए थे। चबूतरा मंदिर परिसर में स्थित है। उसमें कृष्ण लीला में कृष्ण जन्म से लेकर कंस वध तक और मथुरा में भगवान कृष्ण के शासन के उल्लेख के करीब 26 शिलापट्ट मिले हैं।
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शिलालेख
- फोटो : अमर उजाला
बलुआ पत्थर की इन शिलाओं में कृष्ण लीला के विभिन्न कथानकों को प्रतिमाओं के माध्यम से वर्णित किया गया है। आगे भी इस स्थल पर सर्वेक्षण होने पर और भी साक्ष्य मिल सकते हैं।
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श्रीकृष्ण प्रतिमाएं
- फोटो : अमर उजाला
प्रोफेसर नागेश दुबे बताते हैं कि ऐरण में कृष्ण की लीलाओं से संबंधित करीब 26 शिलापट्ट मौजूद हैं, जिनमें कृष्ण जन्म के पूर्व देवकी और वासुदेव द्वारा चतुर्भुजी भगवान विष्णु की आराधना, कारागार में कृष्ण जन्म, माता देवकी की गोद में कृष्ण का चित्रण, कृष्ण जन्म के समय आकाश से पुष्प वर्षा, कृष्ण को पिता वासुदेव कारगाह से लेकर यशोदा को सौंपते हुए और नवजात कन्या लेते हुए देवकी और वासुदेव के छह नवजात शिशुओं को मारता हुआ कंस, पूतना और शकटासुर वध और व्याकुल यशोदा का चित्रण, कुबेर पुत्रों को नारद के श्राप से मुक्ति, बालसखाओं के साथ गाय चराते और यमुना में कालिया नाग को मारते हुए कृष्ण, माखन चोर कृष्ण की यशोदा से शिकायत, गुरुकुल में कृष्ण और बलराम की शिक्षा प्रारंभ, कृष्ण का उपनयन संस्कार, मथुरा में कृष्ण का स्वागत, नंदगांव से मथुरा जाते समय कृष्ण का गोपियों से प्रेमालाप, कंस के राज दरबार का दृश्य, कृष्ण और कंस का संवाद, कंस वध का चित्रण, महाराज अग्रसेन का कृष्ण द्वारा राज्य रोहण, कंस वध के बाद देवताओं की समय में नारद का वीणा वादन का चित्रण ऐरण में मौजूद है। जो बिखरे हुए पड़े थे।
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श्रीकृष्ण प्रतिमाएं
- फोटो : अमर उजाला
इन्हें करीब 50 साल पहले ऐरण मंदिर परिसर में मौजूद एक चबूतरे में जड़ दिया गया है। ताकि उनको कोई नुकसान न हो, इनको संरक्षित करने का काम भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग कर रहा है।
सागर जिले की बीना तहसील अंतर्गत आने वाले ऐरण तक जाने के लिए सड़क मार्ग तो है, लेकिन यहां आवागमन के सार्वजनिक साधन उपलब्ध नहीं हैं। यहां अपने निजी वाहन से सड़क मार्ग से खुरई बीना से पहुंचा जा सकता है। इसके अलावा रेल मार्ग से यहां की निकटतम रेलवे स्टेशन मंडी बमौरा जो की 10 किमी दूरी पर है तथा बीना जंक्शन जो कि 20 किमी के लगभग है। यहां से प्राइवेट टैक्सी करके इस स्थान पर जाया जा सकता है। ...सागर से कृष्णकांत नगाइच की रिपोर्ट