मध्य प्रदेश की बैगा और गोंड जनजातियां जंगलों में रहती हैं। धीरे-धीरे इन जनजातियों की नई पीढ़ियां अपने पुराने रीति रिवाज़ों को छोड़ रही हैं।
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पधारियां गांव के मुखिया प्रेम कहते हैं कि उनके गांव के कुछ घरों में टीवी सेट पहुंच चुके हैं, जिससे गांव के लोग नए फैशन, गीत-संगीत और फिल्मों से जुड़ रहे हैं।
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70 साल के बैसुखा (बीच में) अपने पोते-पोतियों के साथ घर पर हैं। वे कहते हैं कि गांव के बुजुर्ग धोती और बंडी पहनते हैं जबकि आज-कल के बच्चे पैंट शर्ट पहनने लगे हैं।
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उजियारो बाई के पूरे शरीर पर टैटू बना है। वे कहती हैं कि टैटू बैगा जनजाति की पहचान है, लेकिन अब लड़कियां स्कूल जाने लगी हैं और टैटू गुदवाने से इंकार करती हैं। आज-कल की लड़कियों को इन पारंपरिक टैटू से शर्म महसूस होती है।
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इतवारी सिंह जंगली जानवरों के शिकार के लिए तीर-कमान का इस्तेमाल करते थे। लेकिन अब बैगा समुदाय में शिकार करना लगभग खत्म हो गया है, इतवारी के बेटे रामनाथ बताते हैं कि वे अब मांसाहार के लिए मुर्गों और बकरों को पालते हैं।
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13 साल की सरस्वती स्कूल जाने के लिए तैयार हो रही हैं। सरस्वती के घर में अब शौचालय भी बन गया है। वह बताती है कि पहले उन्हें शौच के लिए खुले में जाना पड़ता था, जिसमें उन्हें बहुत डर लगता था।
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स्कूल में बच्चों को पढ़ाती संतोषी। उनके स्कूल में लगभग 90 बच्चे पढ़ते हैं। वह बताती हैं कि मॉनसून के वक्त बहुत बच्चे बीमार पड़ जाते हैं और स्कूल नहीं आ पाते।
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सुमित्रा कहती हैं कि बहुत से बच्चे स्कूल में फेल हो जाते हैं क्योंकि वे स्कूल जाने के साथ-साथ घर का काम भी करते हैं। 25 साल की सुमित्रा कहती हैं कि जब उनके बच्चे होंगे तो वे उन्हें जरूर स्कूल भेजेंगी।
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सीता और कोटा जुड़वा बहनें हैं। दोनों घर में खाना बनाने और पीने के लिए पानी ला रही हैं। सीता कहती है कि उन्हें पानी लाने के लिए रोजाना दो से तीन चक्कर लगाने पड़ते हैं।
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बदरी बाई (बाईं तरफ) अपने पति और तीन बच्चों के साथ रहती हैं। अनीता उनकी 15 वर्षीय बेटी है। बदरी कहती हैं कि घर में बहुत काम होता है अगर अनीता स्कूल जाने लगेगी तो घर में उनका हाथ कौन बटाएगा।
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प्रभा सुबह जल्दी उठ जाती है और स्कूल जाने से पहले घर के लिए पानी भरने का काम पूरा करती हैं। गर्मियों में उन्हें गांव के कुएं तक जाना पड़ता है क्योंकि उस वक्त हैंडपम्प सूख जाते हैं।
बैगा जनजाति की ये महिलाएं राशन की दुकान के सामने बैठी हैं। यहां सरकारी दरों पर चावल, चीनी, नमक और मिट्टी का तेल मिलता है। कई बार दो-दो दिन तक राशन का इंतजार करना पड़ता है।