मध्य प्रदेश के जबलपुर में कॉलेज छात्रा से रेप करने वाले छात्र नेता शुभांग गोटियां की जमानत सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दी है। रेप के आरोपी छात्र नेता को सात दिनों के भीतर सरेंडर करना होगा।
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रेप के आरोपी छात्र नेता शुभांग गोटियां की जमानत रद्द।
- फोटो : अमर उजाला
मध्य प्रदेश के जबलपुर में कॉलेज छात्रा से रेप करने वाले छात्र नेता शुभांग गोटियां की जमानत सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दी है। रेप के आरोपी छात्र नेता को सात दिनों के भीतर सरेंडर करना होगा।
रेप के आरोप में गिरफ्तार छात्र नेता को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने नवंबर 2021 में जमानत दी थी, रिहाई के बाद छात्र नेता के समर्थकों ने पूरे शहर में भैया इज बैक जैसे पोस्टर्स छात्र नेता के स्वागत में लगाए थे, जिसे आधार बनाकर पीड़ित छात्रा ने सुप्रीम कोर्ट में छात्र नेता की जमानत रद्द करने की याचिका दायर की थी।
मुख्य न्यायाधीश एन वी रमना की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने गुरुवार को कहा कि एकमात्र आधार जिस पर उच्च न्यायालय द्वारा जमानत दी गई है, वह अपीलकर्ता / शिकायतकर्ता की ओर से प्राथमिकी दर्ज करने में देरी है, इसके लिए कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि जमानत अर्जी पर फैसला करने में अदालतों के विवेक का इस्तेमाल न्यायिक दिमाग के उचित आवेदन के बाद किया जाना चाहिए न कि नियमित तरीके से।
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सितंबर में छात्र नेता ने किया था सरेंडर (फाइल फोटो)
- फोटो : सोशल मीडिया
जस्टिस कृष्ण मुरारी और हेमा कोहली की बेंच ने कहा कि न्यायालय ने माना है कि जमानत को रद्द करने के लिए बहुत ही कठोर और भारी परिस्थितियां आवश्यक हैं और एक बार दी गई जमानत को यांत्रिक तरीके से रद्द नहीं किया जाना चाहिए। यह भी उतना ही सच है कि जमानत का एक अनुचित या विकृत आदेश सुपीरियर द्वारा हस्तक्षेप के लिए कमजोर है।
शिकायतकर्ता के वकील ने तर्क दिया था कि "जमानत आदेश रद्द किया जाना चाहिए क्योंकि छात्र नेता का पिछला आपराधिक इतिहास रहा है और रिहाई के बाद उसका घोर आचरण भी पाया गया। सबूत के तौर पर छात्र नेता के सोशल मीडिया में मौजूद स्नैपशॉट के साथ ही उसकी तस्वीरों का संदर्भ दिया गया था। पोस्टरों / होर्डिंग पर सबसे आगे समाज के कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों के चेहरे थे, वहीं, छात्र नेता के स्वागत में 'भैया इज बैक,' बैक टू भैया ', और' वेलकम टू रोल जानेमन (जानेमन) जैसे कैप्शन लिखे गए थे।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भले ही यह मान लिया जाए कि विचाराधीन पोस्टर उनकी नजरबंदी से रिहाई के समकालीन नहीं थे, सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरों के लिए टैग किए गए कैप्शन समाज में उनके और उनके परिवार की श्रेष्ठ स्थिति और शक्ति को उजागर करते हैं। अपीलकर्ता/शिकायतकर्ता पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं।
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आरोपी के रिहा होने पर साथियों ने लगाए थे भैया इज बैक वाले पोस्टर।
- फोटो : सोशल मीडिया
कैप्शन के साथ टैग किए गए मुकुट और दिलों की इमोजी आरोपी द्वारा चित्रित की जाने वाली किसी भी धार्मिक भावनाओं से रहित हैं। दूसरी ओर, वे आरोपी और उसके उत्सव के मूड को बढ़ाते हैं। उनके समर्थकों को एक गंभीर अपराध के लिए हिरासत में लिए जाने के दो महीने से भी कम समय में नजरबंदी से रिहा कर दिया गया है, जिसमें कम से कम दस साल की सजा हो सकती है जो कि जीवन तक भी बढ़ सकती है।
पीठ ने कहा कि आरोपी के निर्लज्ज आचरण ने पीड़िता के मन में एक वास्तविक भय पैदा कर दिया है कि यदि वह जमानत पर रहता है तो उसे एक स्वतंत्र और निष्पक्ष सुनवाई नहीं मिलेगी और यह कि उसके प्रभावित होने की संभावना है। इस दौरान बेंच ने पीड़िता के पिता की जबलपुर पुलिस अधीक्षक को एक अभ्यावेदन देने वाली बात का जिक्र भी किया।
मामले की सुनवाई के दौरान तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आरोपी जमानत की रियायत के लायक नहीं है। रिकॉर्ड पर लाई गई प्रासंगिक सामग्री को उच्च न्यायालय ने जमानत देते समय अनदेखा कर दिया है। पीठ ने कहा कि उल्लेखित प्रतिकूल परिस्थितियों की निगरानी भी जमानत रद्द करने का वारंट है। आक्षेपित आदेश को रद्द किया जाता है और अपास्त किया जाता है और आरोपी छात्र नेता को आदेश के पारित होने की तारीख से एक सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया जाता है। हालांकि यह स्पष्ट किया जाता है। कि ऊपर की गई टिप्पणियां प्रतिवादी को जमानत देने वाले आदेश में कमजोरियों की जांच करने तक ही सीमित हैं।
आरोपी छात्र नेता को नवंबर 2021 में मप्र हाईकोर्ट ने जमानत दी थी।
- फोटो : सोशल मीडिया
प्राथमिकी में आरोप लगाया गया है कि आरोपी ने लड़की से शादी करने का झूठा वादा कर तीन साल से अधिक समय तक कई मौकों पर उसके साथ संबंध बनाए। छात्र नेता को पिछले साल सितंबर में गिरफ्तार किया गया था। उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए जमानत दे दी कि पूरी सुनवाई अवधि के दौरान आरोपी को हिरासत में रखने की जरूरत नहीं है। आरोपी ने हाईकोर्ट में दलील दी थी कि उसकी रजामंदी थी।
क्या है पूरा मामला
28 साल के छात्र नेता ने कॉलेज में पढ़ने वाली 23 वर्षीय छात्रा से दोस्ती कर उसे प्यार के जाल में फंसाया था, बाद में उससे कई बार शारीरिक संबंध बनाएं थे, जब छात्रा गर्भवती हो गई तो छात्र नेता के परिजनों ने दोनों की शादी कराने और बदनामी के डर से छात्रा का जबरन गर्भपात करा दिया। बाद में आरोपी ने शादी से इंकार कर दिया, जिसके बाद पीड़िता ने छात्र नेता के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। आरोपी ने सितंबर में थाने में जाकर आत्मसमर्पण किया था, जिसे नवंबर में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जमानत दे दी थी।