परिवार के साथ हर्षिता
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अतिरिक्त गतिविधियों का मिला लाभ
हर्षिता का मानना है कि प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों को केवल किताबी ज्ञान तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि अन्य गतिविधियों में भी सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। वे स्वयं भी भाषण, वाद-विवाद और निबंध लेखन में गहरी रुचि रखती रही हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में नेतृत्व भी कर चुकी हैं। उन्होंने बताया, इन गतिविधियों का लाभ मुझे परीक्षा में मिला। मेरा हिंदी का पेपर सबसे बेहतर रहा।
परिवार और शिक्षकों का मिला पूरा साथ
इस कठिन सफर में हर्षिता को अपने शिक्षकों, माता-पिता और विशेष रूप से अपनी दादी का भरपूर सहयोग मिला। उनकी मां, सुनीता दवे ने बताया कि पढ़ाई के दौरान वे और हर्षिता की दादी हमेशा उसका ख्याल रखती थीं। हर्षिता ने अपनी सफलता के लिए अपने प्रारंभिक विद्यालय सरस्वती शिशु मंदिर, माधव विद्यापीठ और कोचिंग संस्थान आजाद पी-3 क्लासेस के शिक्षकों का भी आभार व्यक्त किया है।
बचपन से ही प्रतिभा की धनी
हर्षिता की मां सुनीता दवे, गर्व से बताती हैं कि उनकी बेटी बचपन से ही प्रतिभाशाली रही है। मात्र ढाई साल की उम्र में ही उन्होंने मंच पर बोलना शुरू कर दिया था। वह एक बेहतरीन वक्ता और अंतरराष्ट्रीय स्तर की डिबेटर रही हैं। उनकी मां के अनुसार, हर्षिता की जिद और लक्ष्य बनाकर आगे बढ़ने की आदत ने ही उसे यह सफलता दिलाई है। हाई स्कूल से लेकर कॉलेज तक उन्हें स्कॉलरशिप मिलती रही, जिससे उनकी पढ़ाई का खर्च भी काफी कम रहा। साहित्य अकादमी के निदेशक और हर्षिता के पिता, डॉ. विकास दवे ने बेटी की सफलता का श्रेय उसके गुरुओं को दिया। उन्होंने कहा, अब समय आ गया है, जब हम यह गर्व से कह सकते हैं कि बेटियां अपने पूरे कुल को गौरवान्वित करने में सक्षम हैं। कोई भी बेटी बेटे से कम नहीं है।