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क्या लड़कों के मैच में अंपायरिंग करोगी... जवाब ने बदली जिंदगी, इन महिलाओं ने खेलों में लिखी नई इबारत

Sun, 03 Mar 2019 08:39 PM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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अपराजिता - फोटो : amar ujala
'भंवर से लड़ो, तंग लहरों से उलझो, कहां तक चलोगे किनारे-किनारे'
खेल-खेल में वे खुद को साबित करती जा रही हैं। आस-पड़ोस तो कभी नाते-रिश्तेदारों के ताने, कभी सुविधाओं का अभाव भी झेला, इसके बावजूद वे टूटीं नहीं, आगे बढ़ीं और बढ़ती ही गईं और देश भर में नाम कमाया। इनमें से कई एक सुनहरे दौर को बिताने के बाद, अब देश के लिए नए धुरंधर तैयार करने में जुटी हैं। वे देश के लिए खेलती हैं, बिना अभावों की चिंता किए। आइए उनके इस जज्बे को सलाम करते हैं और साझा करते हैं, उनके संघर्ष व सफलता की कहानी...। रोली खन्ना की रिपोर्ट...
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- फोटो : amar ujala
...और बन गईं कराटे की चैम्पियन
डॉक्टर ने कहा, लड़की कमजोर है। सेहत के लिए फिटनेस पर ध्यान देना होगा। इसे देखते हुए मां ने कराटे क्लास में एडमिशन करा दिया। खेलते-खेलते वह कराटे की राष्ट्रीय चैम्पियन बन गईं। आज उनकी कराटे टेक्निक के आगे अच्छे-अच्छे मात खाते हैं। बीएससी की पढ़ाई के साथ-साथ प्राची वर्मा की कराटे प्रैक्टिस व विभिन्न प्रतियोगिताओं में भागीदारी जारी है। खास बात है कि छोटी-सी उम्र में वे छात्राओं को सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग भी देती हैं।

अब कोई नहीं लेता पंगा
प्राची बताती हैं कि तीन भाई-बहन हैं वे लोग। भाई बड़ा और बहन छोटी है। मम्मी हाउस वाइफ हैं और पापा आरडीएसओ में हैं। फिलहाल फोकस बीएससी की पढ़ाई पर है। हंसते हुए बताती हैं, पहले थोड़ा-थोड़ा डर लगता था, अब तो सब हमसे डरते हैं। कराटे है ही ऐसी टेक्निक कि कोई आपसे पंगा नहीं लेगा। प्राची के मुताबिक, लड़कियों को सेल्फ डिफेंस टेक्निक का इस्तेमाल करना आना चाहिए।

आगे का इरादा
प्राची कहती हैं कि अब तो ओलंपिक में भी कराटे को शामिल कर लिया गया है, इसलिए अगला लक्ष्य ओलंपिक में मेडल जीतना है।
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अपराजिता - फोटो : amar ujala
शहर की पहली महिला क्रिकेट अम्पायर
शहर के क्रिकेट के मैदान में पहली बार जब वे अम्पायरिंग करने उतरीं तो किसी को यकीन ही नहीं हुआ कि हर बॉल, हर एक्शन पर पैनी नजर है एक लड़की की। यह कोई सामान्य लड़की नहीं, क्रिकेट की पहली महिला अंपायर हैं काजल राठौर। बचपन से लड़कों के साथ खेलते-खेलते कब क्रिकेट खेलने का शौक पैदा हो गया, पता ही नहीं चला। हालांकि पहले बेसबॉल खेलती रहीं। ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी लेवल पर 13 नेशनल मैच खेले। फिर अचानक से रुख क्रिकेट की ओर हो गया।

इस बीच लखनऊ क्रिकेट एसोसिएशन की ओर से अम्पायर एग्जाम का आयोजन किया गया। काजल कहती हैं, सीनियर्स ने सलाह दी परीक्षा देने की। आवेदन करने वाली मैं अकेली लड़की थी। परीक्षा भी पास कर ली। इंटरव्यू में पूछा गया कि क्या लड़कों के मैच में अम्पायरिंग करोगी। मैंने कहा, ‘हां जरूर करूंगी’। बस, मेरा सलेक्शन हो गया। अब तक 50 से अधिक मैचों में अम्पायरिंग कर चुकी हूं।

काजल बताती हैं, मेरी पैदाइश लखनऊ में हुई। समाजशास्त्र में एमए और बीपीएड किया है। एक बहन नर्सिंग के क्षेत्र में है, जबकि भाई डांस टीचर है। मां बाल विकस एवं पुष्टाहार विभाग में कार्यरत हैं। आज मैं जो कुछ हूं, मां मंजू राठौर के कारण हूं।

यूपीसीए का एग्जाम क्वालिफाई करना है। मेरी राह आसान है, क्योंकि मां के साथ-साथ मुझे लखनऊ क्रिकेट एसोसिएशन के अधिकारियों का सहयोग मिला है। बिना किसी भेदभाव मुझे हर कदम पर प्रोत्साहित किया जाता है।

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लंगड़ी टांग खेलते-खेलते बनीं एथलीट और इंटरनेशनल शूटर
खेलना इतना पसंद था कि जब मौका मिलता, खेलने निकल पड़तीं। डांट पड़ती तो छिप कर खेलतीं। लंगड़ी टांग में एक्सपर्ट थीं। खेलते-खेलते खेल को लेकर इतना गंभीर हो गईं कि इसे ही कॅरिअर बनाने का फैसला कर लिया। रचना गोविल ने हाईस्कूल से सीरियस स्पोर्ट खेलना शुरू किया। उनके बारे में कहा जाता है कि वे एक बेहतरीन प्रतिद्वंद्वी थीं। खास बात है कि वह एकमात्र ऐसी खिलाड़ी हैं जिन्होंने एथलीट व शूटिंग दोनों में टॉप रैंक हासिल की है।

अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित रचना गोविल के बारे में कम ही लोग जानते हैं कि वे मणिपुरी डांस में भी पारंगत हैं। वह यूपी की पहली खिलाड़ी थीं, जिन्होंने इंदिरा मैराथन जीती। स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया में यह उनका दूसरा कार्यकाल है। पहली बार यहां 2011 से 2014 तक रहीं। बॉक्सिंग, ताइक्वांडो, रेसलिंग की लड़कियों के लिए हॉस्टल शुरू कराने का श्रेय उन्हें ही जाता है। दूसरे कार्यकाल में वह खिलाड़ियों का मनोबल कभी नहीं टूटने देने का संकल्प लेकर जुटी हैं।

रचना बताती हैं, जब मैं पहली बार लखनऊ में दौड़ी तो हर किसी ने आलोचना की। घर आकर कहा कि लड़की बिगड़ गई है। उन दिनों खेल कॅरिअर था ही नहीं। जीतकर आ गए तो भी रोटी बनाओ यही सोच थी समाज की। ऐसे में मां ने मेरा साथ दिया और हौसला बढ़ाया। मैं पेंटिंग भी अच्छी बनाती थी। मां ही थीं, जो मेरी पेंटिंग ललित कला अकादमी तक लेकर जाती थीं।
आगे का इरादा : जहां तक संभव हो, हर खिलाड़ी का हौसला बढ़ाना है।
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पापा की इच्छा थी मैं खिलाड़ी बनूं
बेटियों को खेल के मैदान में क्यों भेजते हो? शॉर्ट स्कर्ट पहनकर जब घर की बेटी खेलती है तो अच्छा नहीं लगता। ये कुछ सवाल थे, जो अक्सर लोग विनीता शुक्ला को खेलने जाते देखकर उसके मम्मी-पापा से किया करते थे। हालांकि घर के लोगों ने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया। पापा वॉलीबॉल खेलते थे और चाहते थे कि बिटिया भी खिलाड़ी बने। पापा की इच्छा और अपनी रुचि का ध्यान रखते हुए उसने टेबल टेनिस को चुना और खेलती चली गई। टेबल टेनिस खेलना कक्षा 6 से जारी है।

...और बन गईं गोल्डन गर्ल
पैदाइश कानपुर में हुई। सबसे पहले मथुरा में खेला और यूपी लेवल पर गोल्ड मेडल मिला। इसके बाद सिलसिला जारी रहा। अंडर 14 से लेकर अंडर 16 तक खेला, फिर 2011 में यूपी टेबल टेनिस टीम की कैप्टन रहीं। 2009 में नौकरी लगी। पोस्टल ऑफिस के लिए लगातार खेल रही हूं। इंडियन सिविल सर्विसेज में पांच साल तक लगातार मेडल जीते।
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दिल की सुनी और आगे बढ़ती गई
काशी की व्यायामशाला में जिम्नास्टिक की प्रैक्टिस करती थी, पर नेशनल खेलने को कभी नहीं मिला। इस बीच महसूस किया कि वेट लिफ्टिंग पसंद है। खुद की पसंद को तवज्जो दी और स्वाति सिंह ने शुरू कर दी वेट लिफ्टिंग। इसके बाद फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2006 से 2008 तक ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी चैंपियन रहीं। जूनियर वर्ल्ड चैम्पियनशिप साउथ अफ्रीका 2004 में सिल्वर मेडल जीता।

कॉमन वेल्थ गेम्स 2010 में हिस्सा लिया। कोशिशें जारी रहीं और 2014 के कॉमन वेल्थ गेम्स में ब्रॉन्ज मेडल जीता। उसी वर्ष कजाकिस्तान में ओलंपिक क्वालिफाई इवेंट में हिस्सा लिया। इसके बाद पारिवारिक कारणों से ब्रेक ले लिया। फिर लाइफ में ऐसा मोड़ आया कि तय कर लिया कि वापस वेट लिफ्टिंग में खुद को साबित करना है।

वापसी की और खुद को साबित भी किया
बीते दिनों पारिवारिक जीवन में कुछ परेशानी के बाद एक बार फिर स्वाति खेल की ओर लौटीं। लौटते ही इंडिया कैंप में जगह बनाई और थाईलैंड में ईजीयूटी कप 2019 में हिस्सा लेकर साबित कर दिया कि वाकई वह एक पावर वुमन हैं। वर्तमान में रेलवे में हेड टिकट एग्जामिनर स्वाति बताती हैं, बीते दिनों जो कुछ भी हुआ, उसके बाद मैंने केडी सिंह स्टेडियम जाना शुरू किया। लोगों का ध्यान मेरे खेल से ज्यादा मेरे व्यक्तिगत जीवन पर रहता, कई तरह के सवालों का सामना करना पड़ा। ऐसे में गेम पर फोकस करने के लिए मैं लखनऊ से निकल आई।
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कठिन थी स्टेडियम की डगर
परिवार के किसी भी सदस्य का खेल से कोई नाता नहीं था। बनारस के ऊंचगांव में रहती थीं, वहां लड़कियों को ज्यादा पढ़ाने-लिखाने के बारे में भी कोई नहीं सोचता था। पर एथलीट विभा सिंह को तो खेल का मैदान बुला रहा था। छिप-छिप कर स्कूल में खेलती, किसी को बताती नहीं। जब स्टेट लेवल पर मेडल मिला तो घर-गांव के लोगों की सोच बदली।

हां, मां बराबर प्रोत्साहित करती रहती थीं। इन्हीं कोशिशों के बीच पहुंच गईं साई हॉस्टल, फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। कई नेशनल खेले, ऑल इंडिया यूनिवर्सिटीज में अपना सर्वश्रेष्ठ दिया। इन्हीं उपलब्धियों का नतीजा था कि उन्हें यूपी एथलेटिक्स टीम का कोच बना दिया गया।

तैयार कर रहीं एथलीट की नई पौध
विभा बताती हैं, गांव की पगडंडियों से निकल कर बाहर आना काफी कठिन था। 20 किलोमीटर आना, 20 किमी. तक साइकिल चलाकर जाना मेरी दिनचर्या का हिस्सा था। नहीं जाती तो खेल नहीं पाती। अब तक 45 बच्चों को बतौर एथलीट तैयार कर चुकी हूं।

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बचपन के शौक ने बना दिया क्रिकेट कैप्टन
प्रियंका शैली गोरखपुर की गलियों में अक्सर चचेरे भाइयों के साथ प्लास्टिक की बॉल से चौक्का-छक्का लगाती थीं। मम्मी-पापा ने भी कभी रोका नहीं। पढ़ाई के साथ-साथ हॉकी खेलने लगीं। 91-92 तक मंडल हॉकी में काफी धमाल मचाया। इस बीच सहेलियों से पता चला कि लखनऊ में क्रिकेट का ट्रायल हो रहा है। किस्मत आजमाने पहुंच गईं और चयन हो गया। तब से क्रिकेट से रिश्ता जुड़ा जो आज तक जारी है।

यूपी सीनियर गर्ल्स टीम की कोच, सीनियर वीमेन सलेक्शन कमेटी की चेयरपर्सन रहने के साथ वे यूपी सीनियर टीम की सात साल तक कैप्टन रह चुकी हैं। उन्हीं के नेतृत्व में इंडिया ए में वेस्ट इंडीज के खिलाफ भारतीय टीम ने जीत हासिल की थी।

तैयार कर रहीं नई पौध: प्रियंका कहती हैं, मैं लकी हूं कि मुझे मायके और ससुराल दोनों तरफ से भरपूर सहयोग मिला। शादी के बाद भी मेरा खेल जारी रहा। मेरी नानी तो मुझे खेलते देखकर सबसे ज्यादा खुश होती थीं। मेरा परिवार ही मेरी ताकत बना। यदि हर लड़की के साथ उसके घरवालों का सहयोग हो तो फिर कोई भी बेटी असफल हो ही नहीं सकती। प्रियंका फिलहाल क्रिकेट की नई पौध तैयार कर रही हैं।
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निगाहें एशियाड 2021 पर
प्रयागराज में पैदा हुई, खेल का शौक लखनऊ ले आया। अब यहीं एसएसबी में नौकरी और खेल प्रतिस्पर्धाओं की तैयारी जारी है। इंटरनेशनल हैंडबॉल प्लेयर तेजस्वनी सिंह ने 2010 में पहला स्टेट कॉम्प्टीशन खेला था। इसके बाद से बेहतरीन प्रदर्शन का सिलसिला जारी है।

स्टेट खेलने के बाद ही लखनऊ साई हॉस्टल में चयन हो गया। प्रैक्टिस जारी रही। अब तक तीन जूनियर और पांच सीनियर नेशनल खेल चुकी हैं। तीन इंटरनेशनल मैच खेले, जिनमें से एक में गोल्ड हासिल किया।

इस खेल के हालात सुधरे
तेजस्वनी कहती हैं, मैं खुशनसीब हूं कि  पापा ही हमें लेकर ग्राउंड तक गए। घरवालों ने हमेशा हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। यही वजह है कि हम खेल सके और खेलते जा रहे हैं। सुबह और शाम लगातार प्रैक्टिस जारी है। तेजस्वनी के मुताबिक, जब सारे सीनियर्स खेलते थे, तो उनकी उपलब्धियां देखकर खेलने की प्रेरणा मिलती थी।

आगे का इरादा: एशियाड 2021 में देश के लिए गोल्ड लाना  है।
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